उत्तराखंड

हरिपुर का सच: 2023 की आरती से 25 फुट की मूर्ति तक,पहल किसकी, श्रेय किसका?….

ब्यूरों रिपोर्ट

हरिपुर, कालसी

यमुना की धारा बहुत कुछ अपने साथ बहा ले जाती है, लेकिन इतिहास में दर्ज घटनाएं इतनी आसानी से नहीं बहतीं। हरिपुर में आज यमुना घाट, धार्मिक पर्यटन और 25 फुट की यमुना मूर्ति को लेकर जो बहस खड़ी हुई है, उसके पीछे की कहानी को यदि ईमानदारी से देखा जाए तो इसकी शुरुआत आज से नहीं, बल्कि 7 जुलाई 2023 से होती दिखाई देती है।

उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, जीएसआर फाउंडेशन समिति की ओर से नमामि गंगे के तत्वावधान में 7 जुलाई 2023 को हरि घाट पर आरती की शुरुआत कराई गई थी। इसके बाद घाट के विकास को लेकर नमामि गंगे की टीम के साथ प्रस्ताव और कॉन्सेप्ट पर काम आगे बढ़ा तथा मुख्यमंत्री से भी इस संबंध में बैठक हुई।

सरकारी शिलापट्ट पर नाम दर्ज होने से क्या इतिहास भी बदल जाता है?…

बताया गया कि मुख्यमंत्री को हरि घाट के विकास का यह कॉन्सेप्ट बेहद पसंद आया।

इसके बाद कहानी में एक महत्वपूर्ण मोड़ आता है।

15 अगस्त 2023 को मुख्यमंत्री ने अपने अभिभाषण में हरि घाट को विकसित करने की घोषणा की।

जिसके बाद क्षेत्र के कुछ लोगों और भाजपा नेताओं ने मुख्यमंत्री को हरि घाट आने का निमंत्रण दिया और 7 सितंबर 2023, जन्माष्टमी के दिन मुख्यमंत्री ने घाट का शिलान्यास किया।

अब सवाल यह नहीं है कि घाट का विकास होना चाहिए या नहीं।

निश्चित रूप से होना चाहिए…..!

सवाल यह है कि इस पूरी प्रक्रिया की शुरुआत कहां से हुई थी और इसमें किस-किस की भूमिका थी?

क्योंकि आज जब हरिपुर में यमुना घाट और जमुना कृष्ण धाम के विकास की चर्चा होती है, सरकारी शिलापट्ट पर “लोक पंचायत जमुना तीर्थ समिति” का नाम दिखाई देता है, तब स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि 2023 से शुरू हुई इस पूरी यात्रा में पहले की पहल और प्रयासों का उल्लेख कहां है?….

क्या सार्वजनिक परियोजनाओं में योगदान का मूल्यांकन केवल अंतिम चरण के आधार पर होना चाहिए?

या फिर इतिहास को शुरुआत से पढ़ा जाना चाहिए?

सवाल किसी की आस्था पर नहीं, श्रेय की राजनीति पर है।

यहां एक बात साफ होनी चाहिए….!

यमुना की मूर्ति स्थापित करने का विरोध करना और मूर्ति स्थापना की प्रक्रिया पर सवाल उठाना दो अलग-अलग बातें हैं।

यमुना हमारी आस्था का केंद्र है। उसके सम्मान में घाट बने, आरती हो, धार्मिक पर्यटन विकसित हो और यमुना की महिमा को देश-दुनिया तक पहुंचाया जाए। इसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

लेकिन जब किसी धार्मिक परियोजना को सार्वजनिक स्थान, नदी क्षेत्र और सरकारी व्यवस्था से जोड़ा जाता है, तब आस्था के साथ नियम भी चलते हैं।

यही बात 25 फुट की प्रस्तावित यमुना मूर्ति पर भी लागू होती है।

पुराने पुल के पिलर पर इतनी ऊंची प्रतिमा स्थापित करने की कवायद शुरू हुई। गुजरात से मूर्तिकार बुलाए जाने की बात सामने आई।

लेकिन अगर अनुमति की प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही स्थापना का प्रयास किया गया, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।

इतनी जल्दी क्यों?….

क्या धार्मिक उद्देश्य प्रशासनिक प्रक्रिया से ऊपर हो जाता है?

क्या संरचनात्मक सुरक्षा की जांच जरूरी नहीं?

क्या नदी के प्रवाह और बाढ़ की स्थिति का अध्ययन नहीं होना चाहिए?

क्या संबंधित विभागों की अनुमति आवश्यक नहीं?

और सबसे महत्वपूर्ण,

क्या स्थानीय लोगों को विश्वास में लेना जरूरी नहीं?

7 जुलाई 2023 को आरती से शुरू हुई यात्रा का इतिहास कौन लिखेगा?

आज हरिपुर को “यमुनाद्वार” या “यमुना का हरिद्वार” बनाने की बड़ी कल्पना सामने है।

लेकिन हर बड़े सपने के पीछे एक छोटी शुरुआत होती है।

अगर दस्तावेज यह बताते हैं कि 7 जुलाई 2023 को हरि घाट पर आरती शुरू हुई, उसके बाद नमामि गंगे के माध्यम से घाट विकास का कॉन्सेप्ट सामने रखा गया, मुख्यमंत्री के साथ इस संबंध में बैठक हुई और फिर 15 अगस्त 2023 को मुख्यमंत्री ने हरि घाट के विकास की घोषणा की, तो इस क्रम को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

फिर 7 सितंबर 2023 को जन्माष्टमी के दिन शिलान्यास हुआ।

तो सवाल यह है कि?

हरिपुर की इस यात्रा का इतिहास 2023 से लिखा जाएगा या सिर्फ उस दिन से, जब किसी नए शिलापट्ट पर किसी संस्था का नाम लिखा गया?

शिलापट्ट महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन शिलापट्ट इतिहास का पूरा पन्ना नहीं होते।

“इतिहास में विचार भी दर्ज होते हैं, पहल भी, प्रयास भी और परिणाम भी”

सेवा हो तो श्रेय से बड़ी होनी चाहिए…

“सेवा का सबसे सुंदर रूप वही है जिसमें व्यक्ति या संस्था काम करती है और समाज स्वयं उसका मूल्यांकन करता है”

लेकिन जब सेवा के साथ श्रेय की प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाए, तो मूल उद्देश्य पीछे छूटने लगता है।

घाट किसने शुरू करवाया?

आरती की शुरुआत किसने की?

कॉन्सेप्ट किसने दिया?

सरकार तक प्रस्ताव किस माध्यम से पहुंचा?

घोषणा किस आधार पर हुई?

शिलान्यास तक कौन-कौन लोग जुड़े?

और आज परियोजना का श्रेय किसे मिल रहा है?

इन सवालों का जवाब किसी एक व्यक्ति या संस्था को बड़ा अथवा छोटा बनाने के लिए नहीं, बल्कि सार्वजनिक रिकॉर्ड को साफ रखने के लिए जरूरी है।

सरकार की परियोजना है तो पारदर्शिता भी सरकारी होनी चाहिए।

जब मुख्यमंत्री किसी स्थान के विकास की घोषणा करते हैं और उसके बाद सरकारी स्तर पर घाट का निर्माण होता है, तो यह स्वाभाविक रूप से सार्वजनिक परियोजना का स्वरूप ले लेता है।

ऐसी स्थिति में जनता को यह जानने का अधिकार है कि परियोजना की डीपीआर क्या है?

किस विभाग ने तैयार की?

कितनी लागत है?

कौन-कौन से कार्य होने हैं?

किस एजेंसी की जिम्मेदारी है?

नदी क्षेत्र में निर्माण के लिए क्या अनुमति ली गई?

और 25 फुट की मूर्ति के मामले में तकनीकी एवं प्रशासनिक स्वीकृतियां क्या हैं?

इन सवालों का जवाब देना किसी की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाना नहीं है।

बल्कि यही सुशासन और पारदर्शिता है।

जनता के साथ विकास या जनता के ऊपर विकास?….

जौनसार-बावर की जनता अपनी परंपराओं, आस्था और संस्कृति को लेकर बेहद संवेदनशील है।

वह विकास चाहती है।

वह हरिपुर को धार्मिक और पर्यटन मानचित्र पर बड़ी पहचान मिलते देखना चाहती है।

लेकिन वह यह भी चाहती है कि उसके साथ संवाद हो।

अगर हरिपुर को वास्तव में “यमुना का हरिद्वार” बनाना है, तो वहां की जनता को केवल दर्शक नहीं, बल्कि सहभागी बनाना होगा।

क्योंकि विकास जनता के साथ होता है, जनता के ऊपर नहीं?

असली सवाल 25 फुट की मूर्ति से भी बड़ा है।

आज हरिपुर में बहस 25 फुट की यमुना मूर्ति को लेकर है।

लेकिन असली सवाल मूर्ति से बड़ा है..?

सवाल यह है कि,

क्या धार्मिक आस्था के नाम पर प्रक्रिया को दरकिनार किया जा सकता है?

क्या सरकारी परियोजना में किसी की शुरुआती पहल को भुलाया जा सकता है?

क्या शिलापट्ट पर नाम दर्ज होना ही पूरे इतिहास का प्रमाण बन जाता है?

क्या स्थानीय जनता से संवाद किए बिना बड़े धार्मिक प्रतीक स्थापित किए जा सकते हैं?

और सबसे महत्वपूर्ण,

“हरिपुर की इस यात्रा में पहल किसकी थी, घोषणा किस आधार पर हुई, काम किसने कराया और श्रेय आखिर किसका होना चाहिए?”

इन सवालों के जवाब किसी विवाद को बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि विवाद खत्म करने के लिए जरूरी हैं।

क्योंकि दस्तावेज मौजूद हैं तो उन्हें सामने रखा जाना चाहिए।

आरती का रिकॉर्ड है तो वह सार्वजनिक होना चाहिए।

नमामि गंगे के साथ प्रस्ताव और बैठक का रिकॉर्ड है तो उसे सामने आना चाहिए।

मुख्यमंत्री की 15 अगस्त 2023 की घोषणा का रिकॉर्ड है तो वह भी सार्वजनिक है।

7 सितंबर 2023 के शिलान्यास का इतिहास भी सामने है।

फिर इतिहास को अपनी सुविधा के मुताबिक लिखने की जरूरत क्यों?

यमुना सब देख रही है…..!

हरिपुर को धार्मिक पहचान मिले, यह स्वागत योग्य है।

यमुना के किनारे भव्य घाट बने, यह भी स्वागत योग्य है।

आरती हो, धार्मिक पर्यटन बढ़े, स्थानीय युवाओं को रोजगार मिले और जौनसार-बावर की पहचान देश-दुनिया तक पहुंचे, इससे बेहतर क्या हो सकता है?

लेकिन इसके लिए जरूरी है,

नियमों का पालन।

पारदर्शिता।

स्थानीय सहभागिता।

और श्रेय के बजाय सेवा की भावना।

क्योंकि यमुना के किनारे खड़ी 25 फुट की मूर्ति से कहीं ऊंचा सवाल आज हरिपुर के सामने खड़ा है।

“यमुना की सेवा कौन कर रहा है, इतिहास में दर्ज किसका होगा और क्या हरिपुर का फैसला जनता की भागीदारी से होगा?”

शिलापट्ट पर नाम कुछ समय के लिए दिखाई देता है।

लेकिन काम का सच समय की आंखों में दर्ज होता है।

और यमुना की धारा के सामने कोई शिलापट्ट इतना बड़ा नहीं होता कि वह इतिहास को ढक सके।

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