निदेशक भर्ती में ‘डेपुटेशन ओनली’ का खेल, हाईकोर्ट ने पूछा ये बदलाव कहाँ से आया?

ब्यूरों रिपोर्ट
देहरादून। वीर माधो सिंह भण्डारी उत्तराखण्ड तकनीकी विश्वविद्यालय (VMSB-UTU) के पाँच परिसरों में निदेशक पदों की भर्ती अब सिर्फ अदालत की निगरानी में है। 23 सितंबर को हाईकोर्ट ने साफ पूछा पहले खुली भर्ती होती थी, अब अचानक ‘केवल प्रतिनियुक्ति’ क्यों?
मामला जुलाई 2026 के उस विज्ञापन से जुड़ा है, जिसमें पिथौरागढ़, देहरादून, बौन उत्तरकाशी, गोपेश्वर और टनकपुर स्थित संस्थानों के निदेशक पद सिर्फ डेपुटेशन पर भरे जाने का ऐलान किया गया। शर्तें साफ हैं केंद्र या राज्य सरकार, PSU या सरकारी संस्थान में काम कर रहे हों, 15 साल की नियमित सेवा हो, NOC और विजिलेंस क्लियरेंस हो। यानी निजी संस्थानों में काम करने वाले योग्य उम्मीदवार दरवाजे के बाहर।
याचिका में सबसे तीखा सवाल यही है। 2018, 2023 और 2024 के विज्ञापनों में ऐसी बंदिश नहीं थी। तब निदेशक पद व्यापक पात्रता पर खुले थे। अब अचानक दीवार क्यों खड़ी कर दी गई? किस शासनादेश या सक्षम अधिकारी के आदेश से यह फैसला लिया गया? AICTE के मानकों के अनुसार योग्य अभ्यर्थियों को बाहर रखने का आधार क्या है?
कोर्ट ने राज्य सरकार, AICTE और विश्वविद्यालय से जवाब मांगा है। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ के सामने यह मामला रखा गया। अब 5 अक्टूबर को अगली सुनवाई होगी।
दिलचस्प बात यह है कि भर्ती प्रक्रिया रुकने का नाम नहीं ले रही। सूत्रों के मुताबिक 25 सितंबर को साक्षात्कार प्रस्तावित है और करीब 7-8 अभ्यर्थियों को बुलाया जा चुका है। यानी अदालत जवाब मांग रही है, लेकिन इंटरव्यू की तैयारी चल रही है।
यह सिर्फ एक भर्ती का मामला नहीं। सवाल बड़े हैं। क्या तकनीकी शिक्षा के शीर्ष पदों पर सिर्फ सरकारी कर्मचारियों का एकाधिकार होना चाहिए? क्या AICTE के निर्धारित मानकों को दरकिनार करके अतिरिक्त शर्तें थोपी जा सकती हैं? और सबसे महत्वपूर्ण क्या पहले खुली व्यवस्था को बिना स्पष्ट आधार के बंद किया जा सकता है?
हाईकोर्ट अब इन्हीं सवालों का जवाब माँग रहा है। 5 अक्टूबर को जब पक्षकार अपना पक्ष रखेंगे, तब साफ होगा कि पाँचों परिसरों के निदेशक पदों पर यह ‘डेपुटेशन-ओनली’ व्यवस्था कितनी वैध है।



