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“रामनाथ गोयनका की विरासत अब एक राजवंश की पगड़ी बन गई: महेश जेठमलानी।

ब्यूरों रिपोर्ट

नई दिल्ली।  एक सोशल मीडिया पोस्ट ने भारतीय पत्रकारिता के पुराने गौरव और मौजूदा सवालों को एक साथ छू लिया है। ट्वीट में लेखक ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ अखबार पर आरोप लगाया है कि वह अब सत्ता के खिलाफ प्रहरी नहीं, बल्कि एक खास राजनीतिक परिवार का “हाथ का औजार” बन चुका है।

लेखक याद दिलाते हैं कि रामनाथ गोयनका के समय यह अखबार नेहरू-गांधी परिवार की निरंकुश प्रवृत्ति के खिलाफ दीवार की तरह खड़ा था। आपातकाल के दौरान तो यह सचमुच युद्ध मशीन बन गया था। लेकिन उनके निधन के बाद, खासकर उत्तरी संस्करण, “10 जनपथ” के करीब आ गया। यूपीए के बड़े घोटालों 2जी, कोयला, कॉमनवेल्थ पर अखबार कभी आगे नहीं बढ़ा। 2012 में जब यूपीए डगमगा रही थी, तो एक झूठी खबर छापी गई कि दो सेना इकाइयाँ दिल्ली की ओर बढ़ रही हैं। लेखक इसे सेना की छवि खराब करने वाली “अविश्वसनीय” कहानी बताते हैं।

2014 के बाद से, ट्वीट के मुताबिक, अखबार विपक्षी एजेंडे का अग्रदूत बन गया। चुनाव, संसद सत्र या किसी बड़े विदेशी मेहमान के आने से पहले वही मुद्दे फ्रंट पेज पर आ जाते हैं, जिन्हें विपक्ष बाद में बड़ा बनाने वाला होता है।

ताजा विवाद: SIR और चुनाव आयोग…..!

सबसे ताजा हमला 23 से 25 सितंबर की तीन दिनों की फ्रंट पेज रिपोर्टों पर है। अखबार ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर आरोप लगाया कि उन्होंने SIR (मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन) प्रक्रिया में अपने दो सहयोगियों को दबाया और नियमों का उल्लंघन किया। आयोग को “बँटा हुआ घर” और मुख्य आयुक्त को “पक्षपाती” बताते हुए विपक्ष में तूफान आ गया। “वोट चोरी, कानून चोरी, संस्था चोरी” के नारे लगे। कुछ ने तो ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी और प्रधानमंत्री-गृह मंत्री की जाँच तक की माँग कर दी।

लेकिन अगले ही दिन पूरा चुनाव आयोग सामने आ गया। तीनों सदस्यों ने संयुक्त बयान जारी कर साफ कहा कि SIR और मतदाता सूची अपडेट प्रक्रिया में मतभेद सिर्फ “चेक एंड बैलेंस” थे। अंतिम फैसलों पर पूरी सहमति थी। कोई भी फैसला एकतरफा नहीं लिया गया।

लेखक इसे “झूठे आख्यान पर आधारित असफल हमला” बताते हैं। उनका कहना है कि संस्थाओं की विश्वसनीयता को नुकसान पहुँचाकर राजनीतिक करियर बचाने की कोशिश हो रही है। सबसे बड़ी बात, यह भारतीय मतदाता के फैसले का अपमान है।

पुराने गौरव का दुख……!

ट्वीट के अंत में लेखक का स्वर बदल जाता है। वे कहते हैं “मैं व्यक्तिगत रूप से दुखी हूँ कि एक जमाने का महान अखबार को अब क्या हो गया है। रामनाथ जी की सच्चाई और न्याय की लड़ाई की विरासत अब छिन्न-भिन्न है। उनके वंशजों के हाथों वही अखबार राष्ट्रीय हित का प्रहरी से एक राजवंश का पालतू बन गया।”

यह ट्वीट सिर्फ एक अखबार की आलोचना नहीं है। यह उन बड़े सवाल को छूता है कि क्या पत्रकारिता अब सत्ता के खिलाफ सच्चाई का दर्पण है, या फिर किसी खास राजनीतिक खेमे का विस्तार। चुनाव आयोग के तीनों सदस्यों के संयुक्त बयान ने एक तरफ की कहानी को चुनौती दी है। बाकी फैसला पाठक और समय के हाथ में है।

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