उत्तराखंड

अंग्रेजों के दौर के जंगलों के हक से FRA तक पहुंची जौनसार-बावर की लड़ाई।

ब्यूरों रिपोर्ट

देहरादून /चकराता… जौनसार-बावर में जल, जंगल और जमीन पर पारंपरिक हक-हकूकों को लेकर चल रही लड़ाई अब ऐतिहासिक दस्तावेजों से निकलकर वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 तक पहुंच गई है। हक-हकूक जल, जंगल, जमीन संरक्षक समिति का दावा है कि जौनसार-बावर के जंगलों पर स्थानीय समुदायों के पारंपरिक अधिकार अंग्रेजी शासन के समय से दर्ज रहे हैं, लेकिन समय के साथ इन अधिकारों को सीमित कर दिया गया। समिति अब पुराने वन बंदोबस्त, बाजिब-उल-अर्ज और माफी की लकड़ी से जुड़े रिकॉर्ड को आधार बनाकर इन अधिकारों की पुनर्स्थापना की मांग कर रही है।

माफी की लकड़ी, चारा-पत्ती और पारंपरिक वन अधिकारों को लेकर ग्रामीणों का दावा; वन विभाग की कार्रवाई पर उठे सवाल।

समिति के अनुसार ब्रिटिश शासन के दौरान जौनसार-बावर में वन बंदोबस्त की प्रक्रिया के तहत जंगलों को अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित किया गया था। पुराने दस्तावेजों में ग्रामीणों के लिए ईंधन, चारा, लकड़ी और अन्य पारंपरिक जरूरतों से जुड़े अधिकारों का उल्लेख मिलता है। समिति का कहना है कि स्थानीय लोगों के पारंपरिक वन अधिकारों में माफी की लकड़ी भी महत्वपूर्ण रही है।

स्थानीय लोगों के मुताबिक गांव की आबादी के आधार पर उन्हें पारंपरिक रूप से प्रतिवर्ष निर्धारित मात्रा में लकड़ी उपलब्ध कराई जाती थी। इसी व्यवस्था को स्थानीय स्तर पर माफी की लकड़ी कहा जाता है। ग्रामीणों का दावा है कि इसका उल्लेख पुराने वन एवं राजस्व रिकॉर्ड में भी मिलता है। उनका आरोप है कि वर्तमान में माफी की लकड़ी प्राप्त करने के लिए उन्हें वन विभाग के अधिकारियों के चक्कर लगाने पड़ते हैं और कई बार प्रक्रिया में अनावश्यक अड़चनें आती हैं।

चारा-पत्ती और ईंधन पर भी कार्रवाई का आरोप……!

ग्रामीणों का कहना है कि जिन जंगलों का उपयोग उनके पूर्वज पीढ़ियों से पशुओं के लिए चारा, पत्ती और घरेलू जरूरतों के लिए करते आए हैं, उन्हीं जंगलों से पारंपरिक उपयोग के लिए सामग्री लेने पर कई बार वन विभाग की ओर से चालान की कार्रवाई की जाती है। समिति का आरोप है कि यदि पुराने बंदोबस्त और हक-हकूक रिकॉर्ड में स्थानीय समुदायों के पारंपरिक अधिकार दर्ज हैं, तो उन अधिकारों की वर्तमान स्थिति स्पष्ट किए बिना ग्रामीणों पर कार्रवाई करना उचित नहीं है।

समिति का दावा है कि अंग्रेजी शासन के समय तैयार किए गए बाजिब-उल-अर्ज और अन्य बंदोबस्ती अभिलेखों में जौनसार-बावर के जंगलों तथा ग्रामीणों के उपयोग से जुड़े अधिकारों का उल्लेख मिलता है। हालांकि इन ऐतिहासिक श्रेणियों की वर्तमान कानूनी स्थिति और बाद के वन बंदोबस्त में हुए बदलाव को लेकर दस्तावेजी जांच आवश्यक है।

तीन श्रेणियों में बांटे गए थे जंगल…….!

ऐतिहासिक रिकॉर्डों के अनुसार जौनसार-बावर में ब्रिटिश काल के वन बंदोबस्त के दौरान जंगलों को अलग-अलग वर्गों में विभाजित किया गया था। पुराने दस्तावेजों में पहले वर्ग के जंगलों को अधिक संरक्षण वाले सरकारी जंगलों के रूप में रखा गया, जबकि दूसरे और तीसरे वर्ग के जंगलों में ग्रामीणों के पारंपरिक उपयोग से जुड़े अधिकारों का उल्लेख मिलता है।

समिति का कहना है कि स्थानीय स्तर पर इन जंगलों को अव्वल, सोयम और दोयम जैसी श्रेणियों से भी जोड़ा जाता रहा है और ग्रामीणों के पारंपरिक अधिकारों को इन्हीं पुराने रिकॉर्डों के आधार पर समझा जाना चाहिए। हालांकि इन श्रेणियों की वर्तमान वैधानिक स्थिति क्या है और बाद के बंदोबस्त एवं वन अधिसूचनाओं में इनमें क्या परिवर्तन हुआ, यह मूल सरकारी अभिलेखों की जांच से ही स्पष्ट होगा।

अब वन अधिकार अधिनियम बना नया कानूनी आधार…!

जंगल के अधिकारों की इस लड़ाई में समिति अब अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 यानी वन अधिकार अधिनियम का भी हवाला दे रही है।

इस कानून में पात्र अनुसूचित जनजातियों और अन्य पात्र परंपरागत वन निवासियों के व्यक्तिगत एवं सामुदायिक वन अधिकारों को मान्यता देने की व्यवस्था है। इसमें पारंपरिक निस्तार, चारा, लघु वनोपज के संग्रह और उपयोग तथा सामुदायिक वन संसाधनों के संरक्षण और प्रबंधन से जुड़े अधिकार भी शामिल हो सकते हैं।

समिति का तर्क है कि यदि जौनसार-बावर के किसी समुदाय के पारंपरिक वन उपयोग और अधिकार पुराने रिकॉर्ड में दर्ज हैं तथा समुदाय कानून की निर्धारित पात्रता पूरी करता है, तो उन अधिकारों की पहचान और मान्यता के लिए FRA के तहत भी प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।

हालांकि, कानून के जानकारों के मुताबिक केवल अनुसूचित जनजाति क्षेत्र में रहने या लंबे समय से जंगल का उपयोग करने मात्र से हर व्यक्ति को वन अधिकार स्वतः प्राप्त नहीं हो जाते। अधिकारों की मान्यता के लिए कानून में निर्धारित पात्रता, साक्ष्य और ग्रामसभा से शुरू होने वाली प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।

समिति के सामने अब दस्तावेज जुटाने की चुनौती……!

इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका पुराने दस्तावेजों की होगी। समिति यदि अपने दावे को मजबूत करना चाहती है तो उसे पुराने वन बंदोबस्त, पन्नालाल सेटलमेंट, बाजिब-उल-अर्ज, माफी की लकड़ी के पुराने रिकॉर्ड, वन विभाग के छपान एवं वितरण अभिलेख तथा वर्तमान वन वर्गीकरण को सामने लाना होगा।

साथ ही यह भी स्पष्ट करना होगा कि जिन जंगलों से ग्रामीण चारा, पत्ती अथवा लकड़ी लेते हैं, उनकी वर्तमान कानूनी स्थिति क्या है और पुराने हक-हकूक को बाद के किसी बंदोबस्त, अधिसूचना या कानून के जरिए समाप्त अथवा परिवर्तित किया गया है या नहीं।

हक की लड़ाई का अगला पड़ाव दस्तावेजों में…..!

जौनसार-बावर में जंगलों को लेकर जारी विवाद अब महज ग्रामीण बनाम वन विभाग का मामला नहीं रह गया है। एक तरफ ग्रामीण अपने ऐतिहासिक हक-हकूकों और माफी की लकड़ी की व्यवस्था का हवाला दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ वन विभाग वर्तमान वन कानून और अभिलेखों के आधार पर वन प्रबंधन करता है।

ऐसे में असली सवाल यही है कि ब्रिटिश काल के वन बंदोबस्त में स्थानीय समुदायों को मिले अधिकारों का आज की तारीख में क्या कानूनी दर्जा है? क्या वे अधिकार बाद के कानूनों में संरक्षित रहे हैं? और यदि संरक्षित हैं तो उनका क्रियान्वयन क्यों नहीं हो रहा?

इन सवालों का जवाब पुराने दस्तावेजों और वर्तमान राजस्व एवं वन अभिलेखों की पड़ताल से ही सामने आएगा। यही दस्तावेज तय करेंगे कि जौनसार-बावर के ग्रामीणों की यह लड़ाई केवल परंपरागत हक-हकूक की मांग है या इसके पीछे आज भी प्रभावी कानूनी अधिकार मौजूद हैं।

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