उत्तराखंड

किशाऊ बांध के रास्ते में सबसे बड़ी चुनौती जमीन और विस्थापन की।

ब्यूरों रिपोर्ट

86 साल बाद परियोजना को मिली रफ्तार, उत्तराखंड में नौ गांवों के 3406 लोग होंगे प्रभावित; 2500 हेक्टेयर वन भूमि भी आएगी परियोजना की जद में।

देहरादून। करीब 86 साल से फाइलों में अटकी किशाऊ बांध परियोजना अब जमीन पर उतरने की दिशा में आगे बढ़ रही है। 15 सितंबर को छह राज्यों के बीच समझौता होने के बाद परियोजना की अंतिम मंजूरी की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। लेकिन किशाऊ बांध के निर्माण के साथ उत्तराखंड के सामने सिर्फ एक बड़ी परियोजना को धरातल पर उतारने की चुनौती नहीं है, बल्कि उससे भी बड़ा सवाल उन लोगों की जमीन, घर और भविष्य का है, जिनकी जिंदगी इस बांध की झील में समा जाएगी।

उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर टौंस नदी पर प्रस्तावित 232.6 मीटर ऊंचे किशाऊ बांध के निर्माण से दोनों राज्यों के करीब 20 गांव प्रभावित होंगे। किशाऊ कॉरपोरेशन के आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड के नौ गांवों के करीब 3406 लोगों और हिमाचल प्रदेश के आठ गांवों के करीब 2092 लोगों का पुनर्वास किया जाना है। यानी हजारों लोगों को अपनी पुश्तैनी जमीन और घर छोड़कर नई जगह बसना होगा।

सिर्फ घर नहीं, पुश्तैनी जमीन भी जाएगी डूब क्षेत्र में…..!

किशाऊ परियोजना के लिए किए गए सर्वे में बड़ी संख्या में घर, धार्मिक स्थल और सार्वजनिक संपत्तियां प्रभावित होने का अनुमान है। सर्वे के मुताबिक उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में कुल 81,300 पेड़, 631 लकड़ी के मकान, 171 पक्के मकान, आठ मंदिर, छह पंचायतें, दो अस्पताल, सात प्राथमिक विद्यालय, दो मिडिल स्कूल और एक इंटर कॉलेज जलमग्न क्षेत्र में आ सकते हैं।

यानी प्रभावित परिवारों के सामने सिर्फ मकान खोने का सवाल नहीं है। उनकी कृषि भूमि, जंगल से जुड़ी आजीविका, सामाजिक ताना-बाना और वर्षों पुरानी बसावट भी बदल जाएगी।

उत्तराखंड के सामने 2500 हेक्टेयर वन भूमि की चुनौती…!

किशाऊ बांध के लिए उत्तराखंड में करीब 2500 हेक्टेयर वन भूमि परियोजना के लिए हस्तांतरित करनी होगी। वन भूमि के हस्तांतरण के साथ ही क्षतिपूरक वनीकरण के लिए इतनी ही भूमि उपलब्ध कराने की चुनौती भी राज्य के सामने है।

उत्तराखंड में पहले से ही भूमि की सीमित उपलब्धता को देखते हुए यह चुनौती और गंभीर हो जाती है। एक तरफ परियोजना के कारण हजारों लोगों के पुनर्वास के लिए जमीन चाहिए, दूसरी तरफ वन भूमि के बदले क्षतिपूरक वनीकरण के लिए भी भूमि उपलब्ध करानी होगी।

यही वजह है कि किशाऊ परियोजना के साथ सबसे बड़ा सवाल अब यह बन गया है कि विकास के लिए जमीन देने वाले परिवारों को बदले में जमीन कहां मिलेगी और जंगल की भरपाई के लिए जमीन कहां से आएगी?

‘पहले पुनर्वास, फिर निर्माण’ पर टिकी प्रभावितों की उम्मीद….!

किशाऊ परियोजना के प्रभावित परिवारों के लिए पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन यानी R&R योजना को अहम माना जा रहा है। प्रस्तावित व्यवस्था में निर्माण शुरू होने से पहले प्रभावितों के पुनर्वास पर जोर दिया गया है।

जिन परिवारों की अधिकांश या पूरी कृषि भूमि परियोजना में चली जाएगी, उन्हें वैकल्पिक कृषि भूमि उपलब्ध कराने का प्रावधान रखा गया है। सीमांत और आदिवासी बहुल क्षेत्रों में प्रभावित परिवारों को न्यूनतम एक एकड़ कृषि भूमि उपलब्ध कराने की व्यवस्था का भी उल्लेख है।

यदि वैकल्पिक कृषि भूमि उपलब्ध नहीं हो पाती है तो ग्रामीण क्षेत्र में बाजार मूल्य का चार गुना मुआवजा दिए जाने का प्रावधान बताया गया है। मकान प्रभावित होने वाले परिवारों के लिए पुनर्वास कॉलोनियों में विकसित भूखंड उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी प्रस्तावित है।

महिलाओं और अविवाहित बेटियों को भी अलग इकाई मानने का प्रस्ताव….!

किशाऊ परियोजना के पुनर्वास पैकेज में परिवार के भीतर महिलाओं और अविवाहित बेटियों के अधिकारों को लेकर भी विशेष व्यवस्था प्रस्तावित की गई है। वयस्क महिलाओं और अविवाहित बेटियों को अलग इकाई मानकर मुआवजे और पुनर्वास से जुड़े अधिकार देने की बात कही गई है।

दो राज्यों में प्रभावित होने वाले परिवारों के बीच मुआवजे और पुनर्वास को लेकर अंतर न रहे, इसके लिए किशाऊ कॉरपोरेशन लिमिटेड के माध्यम से दोनों राज्यों के प्रभावितों के लिए समान पैकेज तैयार करने की व्यवस्था प्रस्तावित है।

टिहरी का अनुभव किशाऊ के लिए सबसे बड़ी सीख….!

किशाऊ परियोजना के पुनर्वास को लेकर टिहरी बांध का अनुभव सबसे बड़ी पृष्ठभूमि बनकर सामने है। टिहरी परियोजना से हजारों परिवारों का विस्थापन हुआ था और पुनर्वास को लेकर लंबे समय तक सवाल और आंदोलन उठते रहे।

किशाऊ में इसी अनुभव से सबक लेते हुए प्रभावित परिवारों को निर्माण से पहले पुनर्वास, जमीन के बदले जमीन, मुआवजा और आजीविका की वैकल्पिक व्यवस्था देने पर जोर दिया जा रहा है। सामाजिक प्रभाव आकलन के तहत ग्राम सभाओं से संवाद और जनसुनवाई की व्यवस्था भी प्रस्तावित है, ताकि प्रभावित ग्रामीण अपनी आपत्तियां और मांगें सीधे सामने रख सकें।

असली परीक्षा अब कागज से निकलकर जमीन पर…..!

किशाऊ बांध परियोजना के लिए समझौता हो चुका है और वर्षों से अटकी प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। लेकिन परियोजना की वास्तविक परीक्षा अब शुरू होगी।

किसान की जमीन का मूल्य कैसे तय होगा?
पुश्तैनी जमीन के बदले उसे कैसी जमीन मिलेगी?
जिन परिवारों की पूरी जमीन चली जाएगी, उनकी आजीविका कैसे बचेगी?
2500 हेक्टेयर वन भूमि की भरपाई के लिए जमीन कहां से आएगी?
और सबसे महत्वपूर्ण, क्या पुनर्वास पूरा होने के बाद ही बांध का निर्माण शुरू होगा?

इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि किशाऊ बांध सिर्फ एक बड़ी जलविद्युत परियोजना बनकर रह जाता है या फिर विस्थापन और पुनर्वास के मामले में एक नई मिसाल कायम करता है।

फिलहाल किशाऊ बांध का रास्ता जरूर साफ हुआ है, लेकिन बांध बनने से पहले प्रभावितों की जमीन और उनके भविष्य का रास्ता साफ करना सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।

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