उत्तराखंड

शूरवीर सिंह: जब एक महिला के सम्मान के लिए दांव पर लगा दिया पूरा राजनीतिक भविष्य?…

ब्यूरों रिपोर्ट, विक्रम सिंह।

एक ऐसा चुनाव, जिसकी कहानी सरकारी दस्तावेजों में अधूरी है…

चकराता की राजनीति का इतिहास केवल चुनावी आंकड़ों, जीत-हार और नेताओं के नामों से नहीं लिखा जा सकता। इस पहाड़ी अंचल की राजनीति में सामाजिक परंपराओं, रिश्तों, मान-सम्मान और वचन की भी अपनी एक अलग ताकत रही है।

इसी इतिहास का एक ऐसा अध्याय है पूर्व विधायक शूरवीर सिंह जी से जुड़ा 1985 का विधानसभा चुनाव।

सरकारी चुनावी रिकॉर्ड बताता है कि वर्ष 1985 में कांग्रेस के गुलाब सिंह जी चकराता विधानसभा सीट से निर्विरोध निर्वाचित हुए थे। उपलब्ध राजनीतिक इतिहास में भी इसका उल्लेख मिलता है।

लेकिन सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या हुआ था कि जिस चकराता सीट पर गुलाब सिंह जी और शूरवीर सिंह जी जैसे मजबूत राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी आमने-सामने रहे, वहां 1985 में गुलाब सिंह निर्विरोध चुनाव जीत गए?

इस सवाल का जवाब चुनावी आंकड़ों से नहीं, बल्कि उस दौर की स्थानीय राजनीतिक स्मृतियों में मिलता है।

कहानी शूरवीर सिंह जी के घर बोसान से शुरू होती है….!

स्थानीय लोगों और उस दौर से जुड़े लोगों की बताई कहानी के अनुसार, 1985 के विधानसभा चुनाव के दौरान गुलाब सिंह जी अपनी धर्मपत्नी के साथ शूरवीर सिंह जी के घर पहुंचे।

बताया जाता है कि दोनों नेताओं के बीच चुनाव को लेकर बातचीत हुई। गुलाब सिंह ने शूरवीर सिंह से इस चुनाव में उन्हें अवसर देने और अपना नामांकन वापस लेने का आग्रह किया। बदले में अगले चुनाव में शूरवीर सिंह को समर्थन देने और उन्हें निर्विरोध विधायक बनाने का आश्वासन दिए जाने की बात कही जाती है।

लेकिन इस पूरी कहानी में राजनीति से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है जौनसार-बावर की सामाजिक परंपरा।

जब घर आई महिला सिर्फ मेहमान नहीं, सम्मान की जिम्मेदारी बन जाती है।

जौनसार-बावर की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था में महिला के सम्मान को विशेष महत्व दिया जाता रहा है। स्थानीय सामाजिक स्मृतियों में ऐसी परंपरा का उल्लेख मिलता है, जिसे कई लोग स्थानीय बोली में ‘रईण महिला’ के संदर्भ से जोड़कर देखते हैं।

जब किसी परिवार की महिला किसी दूसरे व्यक्ति के घर जाती है तो उसके सम्मान और सुरक्षा की जिम्मेदारी को बेहद गंभीरता से लिया जाता है।

कहानी कहती है कि गुलाब सिंह जी की पत्नी जब शूरवीर सिंह जी के घर पहुंचीं तो शूरवीर सिंह के सामने केवल एक राजनीतिक फैसला नहीं था।

उनके सामने एक महिला के सम्मान और अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के बीच का चुनाव था।

और शूरवीर सिंह जी ने कथित तौर पर राजनीति पर सामाजिक मर्यादा को प्राथमिकता दी।

उन्होंने अपना नामांकन वापस ले लिया।

एक कागज वापस हुआ… और राजनीतिक कहानी बदल गई।

नामांकन वापस लेने के साथ ही गुलाब सिंह जी का निर्विरोध निर्वाचन सुनिश्चित हो गया।

आज चुनावी भाषा में इसे एक सामान्य चुनावी प्रक्रिया कहा जा सकता है। लेकिन स्थानीय राजनीतिक स्मृति में यह घटना इससे कहीं बड़ी मानी जाती है।

क्योंकि एक मजबूत राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी ने चुनावी मैदान से हटने का फैसला किया था।

उपलब्ध रिकॉर्ड शूरवीर सिंह के 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर विधायक बनने की पुष्टि करता है।

इसके बाद 1989 में भी वह चकराता के चुनावी मैदान में उतरे और उपलब्ध स्थानीय राजनीतिक रिकॉर्ड के अनुसार गुलाब सिंह के बाद दूसरे स्थान पर रहे, जबकि मुन्ना सिंह चौहान तीसरे स्थान पर थे।

यानी 1985 में नामांकन वापसी के बावजूद शूरवीर सिंह जी की राजनीतिक पकड़ तत्काल समाप्त नहीं हुई थी।

लेकिन स्थानीय लोगों की मानें तो 1985 का वह फैसला उनके राजनीतिक जीवन का निर्णायक मोड़ जरूर बन गया।

क्या शूरवीर सिंह जी हार गए थे या उन्होंने कुछ बचाया था?

यही से इस कहानी का सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है!

राजनीति के हिसाब से देखें तो शूरवीर सिंह ने अपना चुनावी अवसर खो दिया।

लेकिन सामाजिक दृष्टि से देखें तो कहानी कुछ और कहती है।

उन्होंने एक महिला को सम्मान दिया?

उन्होंने अपने सामने आए सामाजिक दायित्व को राजनीति से ऊपर रखा।

उन्होंने उस परंपरा का सम्मान किया, जिसमें किसी के घर आई महिला की प्रतिष्ठा को परिवार और समाज की प्रतिष्ठा से ऊपर जोड़कर देखा जाता है।

और यही इस कहानी को आज के दौर में भी प्रासंगिक बनाता है।

आज हम महिला सम्मान, महिला गरिमा और महिला सशक्तिकरण की बातें आधुनिक शब्दावली में करते हैं।

लेकिन जौनसार-बावर की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था में महिला के सम्मान को लेकर अपनी सामाजिक मर्यादाएं पहले से रही हैं।

मगर राजनीति ने शायद उनके इस त्याग को याद नहीं रखा….!

स्थानीय राजनीतिक स्मृतियों में यह भी कहा जाता है कि शूरवीर सिंह जी के इस फैसले को बाद में उनके राजनीतिक जीवन के लिए भारी नुकसान माना गया।

राजनीति में जहां जीतने के लिए लोग रिश्ते और वादे तक बदल देते हैं, वहां किसी नेता का अपने राजनीतिक भविष्य की कीमत पर सामाजिक मर्यादा को चुनना अपने आप में असाधारण घटना हो सकती है।

लेकिन विडंबना यह है कि यदि यह कहानी सही है, तो उस समय की राजनीतिक रिपोर्टिंग में इसका वह पक्ष सामने नहीं आया, जो आज सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बन सकता है।

अखबारों में शायद खबर यह रही होगी कि गुलाब सिंह जी निर्विरोध विधायक बन गए।

लेकिन सवाल यह है कि,

क्या असली कहानी यह नहीं थी कि आखिर किसने और क्यों अपना नामांकन वापस लिया?

इतिहास के पन्नों में एक अनुत्तरित सवाल…..!

शूरवीर सिंह जी की कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि इतिहास हमेशा सरकारी दस्तावेजों में पूरा नहीं मिलता।

कभी-कभी इतिहास गांव के बुजुर्गों की स्मृतियों में छिपा होता है।

कभी किसी पुराने राजनीतिक कार्यकर्ता की याद में।

और कभी उस परिवार की बातचीत में, जिसने दशकों पहले किसी फैसले की कीमत चुकाई हो?

1985 का चकराता विधानसभा चुनाव भी शायद ऐसी ही एक कहानी है।

एक तरफ सत्ता थी,

दूसरी तरफ राजनीति,

और बीच में था एक सामाजिक वचन?

अगर स्थानीय राजनीतिक स्मृतियों में दर्ज यह घटनाक्रम सही है, तो शूरवीर सिंह जी का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि उन्होंने चुनाव जीता या हारा।

बल्कि इस सवाल के आधार पर भी होना चाहिए कि,

“क्या उन्होंने राजनीति हारकर भी उस दिन एक सामाजिक मूल्य जीत लिया था?”

और शायद यही वह कहानी है, जिसे चकराता के राजनीतिक इतिहास में अब तक पर्याप्त जगह नहीं मिली।

एक पत्रकार के लिए असली पड़ताल अभी बाकी है…!

इस कहानी की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी अभी भी दस्तावेजों से जोड़ना बाकी है।

1985 के नामांकन पत्र, नामांकन वापसी का आधिकारिक रिकॉर्ड, उस समय के चुनाव अधिकारी के दस्तावेज, तत्कालीन समाचार पत्रों की कटिंग, शूरवीर सिंह जी के परिवार के बुजुर्गों के बयान और गुलाब सिंह जी के परिवार का पक्ष? यदि इन सभी को एक साथ रखा जाए, तो 1985 की इस कहानी की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है।

क्योंकि चुनावी रिकॉर्ड केवल इतना कहता है कि गुलाब सिंह जी निर्विरोध विधायक बने।

लेकिन जौनसार-बावर की राजनीतिक स्मृति पूछ रही है।

“उस निर्विरोध जीत के पीछे किसका त्याग था?” 

 विडंबना देखिए जिस त्याग का बखान पूरे भारत में होना चाहिए था। जिस त्याग के लिए शूरवीर सिंह जी की मूर्ति भारत के संसद भवन परिसर से लेकर उत्तराखंड विधानसभा परिसर तक में होनी चाहिए थी। जिससे देश विदेश के लोग भी उनके इस त्याग का महत्व समझ पाते और दुनिया को हम महिला सशक्तिकरण का इसे सबसे उत्तम उदाहरण बताते, मगर कुछ लोग उनके इतने बड़े त्याग को उनके गांव लखवाड़ में उनकी मूर्ति लगाकर अपने आप को गौरवान्वित महसूस कराना चाहते है।

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