भाजपा जबाब दे,राष्ट्र प्रथम या परिवार प्रथम?…।

ब्यूरों रिपोर्ट, विक्रम सिंह।
भाजपा के टिकट बंटवारे में परिवारवाद के आरोपों पर उठे सवाल, 2024 से 2026 तक कई उदाहरण।
सवाल सीधा है। अगर परिवारवाद राजनीति के लिए अभिशाप है, तो फिर टिकट की बारी आते ही नेताओं के परिवार क्यों याद आने लगते हैं?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लंबे समय से परिवारवाद की राजनीति पर विपक्षी दलों को घेरते रहे हैं। 15 अगस्त 2023 को लाल किले से उन्होंने वंशवादी राजनीति को देश की बड़ी समस्याओं में गिना था। मार्च 2024 में भी उन्होंने कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन की राजनीति को “फैमिली फर्स्ट” के मुकाबले भाजपा की “नेशन फर्स्ट” विचारधारा के रूप में पेश किया।
लेकिन अब सवाल सिर्फ भाषणों का नहीं है।
सवाल टिकट बंटवारे की जमीन पर उतरता है।
2024 से 2026 के बीच भाजपा ने कई ऐसे नेताओं और उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारा, जिनका सीधा पारिवारिक राजनीतिक संबंध रहा है। इनमें कुछ पुराने राजनीतिक परिवार हैं, तो कुछ ऐसे परिवार हैं जिनके सदस्य दूसरे दलों से भाजपा में आने के बाद पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े।
क्या हर राजनीतिक परिवार से आने वाला व्यक्ति अयोग्य है?
बिल्कुल नहीं।
लेकिन भाजपा जिस “परिवारवाद” को विपक्षी राजनीति की बड़ी कमजोरी बताती है, उसी कसौटी को अपने टिकट वितरण पर भी लागू किया जाए, यही इस बहस का असली मुद्दा है।
उत्तर प्रदेश: पिता का टिकट गया, बेटे को मिल गया….!
2024 लोकसभा चुनाव में कैसरगंज सबसे चर्चित उदाहरणों में रहा।
भाजपा ने छह बार के सांसद बृजभूषण शरण सिंह को टिकट नहीं दिया, लेकिन उनकी जगह उनके छोटे बेटे करण भूषण सिंह को उम्मीदवार बना दिया। करण पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे। बाद में उन्होंने चुनाव जीत भी लिया और 1,48,843 वोटों के अंतर से विजयी रहे।
यानी सीट परिवार से बाहर नहीं गई।
चेहरा बदला, राजनीतिक विरासत उसी परिवार में रही।
यहां भाजपा का अपना तर्क हो सकता है कि उम्मीदवार की योग्यता, स्थानीय पकड़ और चुनावी क्षमता भी मायने रखती है। लेकिन विपक्ष इसी उदाहरण को भाजपा के परिवारवाद-विरोधी दावे पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल करता रहा है।
हरियाणा: मां राज्यसभा में, बेटी विधानसभा में….!
2024 हरियाणा विधानसभा चुनाव में भाजपा ने श्रुति चौधरी को तोशाम से टिकट दिया।
खास बात यह थी कि उनकी मां किरण चौधरी जून 2024 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुई थीं और बाद में राज्यसभा पहुंचीं। श्रुति को भाजपा ने उसी तोशाम सीट से उम्मीदवार बनाया, जहां उनकी मां लंबे समय तक विधायक रही थीं।
तोशाम सिर्फ एक सीट नहीं थी।
यह बंसीलाल परिवार की राजनीतिक विरासत से जुड़ी सीट थी।
अब सवाल यह नहीं कि श्रुति योग्य थीं या नहीं।
सवाल यह है कि,
क्या सामान्य भाजपा कार्यकर्ता को भी ऐसी राजनीतिक विरासत के साथ चुनावी मैदान में उतरने का समान अवसर मिलता है?
हरियाणा का दूसरा उदाहरण: भड़ाना परिवार…..!
भाजपा ने 2024 में मनमोहन भड़ाना को समालखा से उम्मीदवार बनाया। वे पूर्व विधायक और भाजपा नेता करतार सिंह भड़ाना के बेटे हैं। मनमोहन भड़ाना ने चुनाव जीता।
इसी चुनावी दौर में करतार सिंह भड़ाना खुद उत्तराखंड की मंगलौर विधानसभा सीट के उपचुनाव में भाजपा उम्मीदवार थे। वे चुनाव हार गए, लेकिन एक ही राजनीतिक परिवार के पिता-पुत्र को अलग-अलग राज्यों की चुनावी राजनीति में भाजपा से टिकट मिलना अपने आप में चर्चा का विषय बना।
एक सवाल फिर सामने आता है कि क्या राजनीतिक परिवार होना सिर्फ संयोग है या संगठन में एक अतिरिक्त प्रवेश-द्वार भी बन जाता है?
हरियाणा में सिर्फ दो नहीं, कई राजनीतिक परिवार….!
2024 की भाजपा उम्मीदवार सूची में आरती राव, केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह की बेटी, को अटेली से टिकट मिला। इसी चुनाव में शक्ति रानी शर्मा, पूर्व कांग्रेस नेता विनोद शर्मा की पत्नी और भाजपा राज्यसभा सांसद कार्तिकेय शर्मा की मां, को कालका से उम्मीदवार बनाया गया। दोनों चुनाव जीत गईं।
भाजपा की हरियाणा सूची पर उस समय Indian Express ने भी “dynasts” यानी राजनीतिक परिवारों से जुड़े उम्मीदवारों की मौजूदगी को प्रमुखता से रिपोर्ट किया था।
यानी मामला सिर्फ एक सीट या एक परिवार तक सीमित नहीं दिखता।
केरल: पिता-पुत्र दोनों भाजपा के टिकट पर…..!
2026 केरल विधानसभा चुनाव में पीसी जॉर्ज और उनके बेटे शोन जॉर्ज दोनों भाजपा के उम्मीदवार बने।
पीसी जॉर्ज पूंजार से और शोन जॉर्ज पाला से चुनाव मैदान में उतरे। केरल चुनाव के आधिकारिक परिणामों में भी दोनों भाजपा उम्मीदवारों के रूप में दर्ज हैं।
शोन जॉर्ज के चुनावी हलफनामे में उनके पिता का नाम P.C. George दर्ज है।
यहां भी वही सवाल कि,
क्या यह परिवारवाद है या नहीं?
भाजपा कह सकती है कि दोनों स्वतंत्र राजनीतिक व्यक्तित्व हैं और अपनी योग्यता के आधार पर चुनाव लड़ रहे हैं।
आलोचक कह सकते हैं कि अगर विपक्षी दलों में पिता-पुत्र एक साथ चुनाव लड़ें तो भाजपा इसे परिवारवाद के उदाहरण के रूप में पेश करती रही है।
तो फिर एक ही कसौटी दोनों जगह क्यों नहीं?
पश्चिम बंगाल: पत्नी और भाई को टिकट….!
2026 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा ने केंद्रीय मंत्री शांतनु ठाकुर की पत्नी सोमा ठाकुर को बागदा से टिकट दिया। वे चुनाव जीतीं। उनके चुनावी हलफनामे में शांतनु ठाकुर को उनके पति के रूप में दर्ज किया गया है।
और यह परिवार भाजपा की राजनीति में नया नाम नहीं है।
2021 में शांतनु ठाकुर के भाई सुब्रत ठाकुर को भाजपा ने गाइघाटा से विधानसभा टिकट दिया था।
यानी राजनीतिक परिवारों की मौजूदगी भाजपा के चुनावी मैदान में पश्चिम बंगाल में भी दिखाई देती रही है।
अर्जुन सिंह का परिवार भी चुनावी मैदान में….!
2026 में पवन कुमार सिंह, भाजपा नेता अर्जुन सिंह के बेटे, भाटपाड़ा से भाजपा उम्मीदवार बने और चुनाव जीते। उनके चुनावी हलफनामे में अर्जुन सिंह को पिता के रूप में दर्ज किया गया है।
यह भी एक ऐसा उदाहरण है जिसे भाजपा के परिवारवाद-विरोधी राजनीतिक विमर्श के संदर्भ में देखा जा सकता है।
लेकिन असली सवाल इससे भी बड़ा है…
यह बहस सिर्फ भाजपा बनाम कांग्रेस की नहीं होनी चाहिए।
कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राजद, शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, द्रमुक, तृणमूल कांग्रेस और देश के कई क्षेत्रीय दलों पर लंबे समय से परिवार आधारित राजनीति के आरोप लगते रहे हैं।
लेकिन भाजपा ने स्वयं को इन दलों से अलग बताते हुए कैडर, संगठन और सामान्य कार्यकर्ता की पार्टी के रूप में स्थापित किया है।
यही वजह है कि भाजपा के टिकट पर किसी बड़े राजनीतिक परिवार के सदस्य को उम्मीदवार बनाए जाने पर सवाल ज्यादा तीखे हो जाते हैं।
क्योंकि एक सामान्य कार्यकर्ता से कहा जाता है कि,
बूथ संभालो।
पोस्टर लगाओ।
लाठी खाओ।
पार्टी के लिए समय दो।
संगठन के लिए जीवन लगाओ।
लेकिन चुनाव आता है तो सवाल उठता है।
टिकट किसे मिला?
जिसने वर्षों संगठन में काम किया?
या फिर,
जिसके पीछे पहले से कोई बड़ा राजनीतिक नाम खड़ा था?
और यही है भाजपा के सामने सबसे बड़ा सवाल?…
अगर किसी नेता का बेटा या बेटी योग्य है तो उसे चुनाव लड़ने से रोकना भी लोकतांत्रिक नहीं है।
लेकिन फिर परिवारवाद की परिभाषा क्या है?
क्या परिवारवाद सिर्फ तब परिवारवाद है जब विपक्ष करे?
और जब वही चीज भाजपा में हो तो उसे।
“योग्यता”,
“जनाधार”,
“जीतने की क्षमता”
या “स्थानीय पकड़”
कहा जाएगा?
अगर यही तर्क है, तो भाजपा को देश के सामने अपनी कसौटी स्पष्ट करनी चाहिए।
कार्यकर्ता पूछ रहा,मेरी बारी कब?…
भाजपा दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टियों में से एक होने का दावा करती है। प्रधानमंत्री खुद 2026 में भाजपा के स्थापना दिवस पर पार्टी कार्यकर्ताओं की मेहनत, अनुशासन, त्याग और समर्पण का उल्लेख कर चुके हैं।
तो फिर पार्टी के भीतर एक सामान्य कार्यकर्ता का सवाल भी जायज है।
मैं 20 साल से पार्टी के लिए काम कर रहा हूं।
मेरे पास संगठन का अनुभव है।
मैंने बूथ से लेकर मंडल तक काम किया।
फिर टिकट की दौड़ में मेरा नाम कब आएगा?
क्या चुनावी राजनीति में प्रवेश के लिए संगठनात्मक मेहनत पर्याप्त है?
या फिर राजनीतिक विरासत और स्थापित नाम का भी एक अलग वजन है?
“परिवारवाद” पर दोहरा पैमाना क्यों?….
प्रधानमंत्री मोदी का परिवारवाद-विरोधी तर्क स्पष्ट है। राजनीतिक दल किसी एक परिवार के नियंत्रण में नहीं होने चाहिए और कार्यकर्ताओं के लिए अवसर खुले होने चाहिए।
अब इसी सिद्धांत की अगली परीक्षा भाजपा के अपने टिकट वितरण में होती है।
अगर परिवारवाद गलत है, तो गलत हर जगह होना चाहिए।
अगर नेता का बेटा-बेटी योग्यता के आधार पर चुनाव लड़ सकता है, तो यही लोकतांत्रिक सिद्धांत विपक्षी दलों पर भी लागू होना चाहिए।
और अगर भाजपा का जवाब है कि,
“परिवार में पैदा होना अपराध नहीं, राजनीति में परिवार के कारण अवसर मिलना ही समस्या है”
तो फिर पार्टी को यह भी बताना होगा कि टिकट तय करने की प्रक्रिया में संगठनात्मक अनुभव, जनाधार और पारिवारिक राजनीतिक विरासत का वजन कितना है?
जनता का सवाल अब सिर्फ नारे का नहीं, प्रक्रिया का है
“राष्ट्र प्रथम” एक राजनीतिक नारा नहीं, एक कसौटी है।
और उस कसौटी पर सिर्फ विपक्ष को नहीं, सत्ता और संगठन में बैठे दलों को भी खुद को परखना होगा।
क्योंकि लोकतंत्र में सवाल यह नहीं कि,
नेता का बेटा चुनाव क्यों लड़ रहा है?
सवाल यह है कि,
क्या वही मौका उस कार्यकर्ता को भी मिलेगा, जिसके पास कोई राजनीतिक पिता नहीं है?
यही सवाल भाजपा से भी पूछा जाएगा।
यही सवाल कांग्रेस से भी पूछा जाना चाहिए।
यही सवाल हर राजनीतिक दल से पूछा जाना चाहिए।
क्योंकि लोकतंत्र में वंश नहीं, अवसर की बराबरी असली कसौटी होनी चाहिए।
और भाजपा के लिए चुनौती सबसे बड़ी इसलिए है क्योंकि उसने खुद परिवारवाद को अपनी राजनीतिक आलोचना का एक प्रमुख मुद्दा बनाया है।
अब जनता पूछ रही है कि,
“विपक्ष का परिवारवाद गलत है तो अपना परिवारवाद क्या है?”
“राष्ट्र प्रथम का नारा टिकट की मेज तक कब पहुंचेगा?”
“और जिस कार्यकर्ता ने पार्टी के लिए जिंदगी खपा दी, उसकी बारी आखिर कब आएगी?”



