उत्तराखंड

किस्तुड़ से उठी आवाज़: 35 साल पुराना जख्म फिर हरा, क्या अब होगी सच की जांच?…।

ब्यूरों रिपोर्ट, विक्रम सिंह।

चकराता विधानसभा के किस्तुड़ गांव से उठी एक आवाज़ अब सिर्फ एक महिला की लड़ाई नहीं रह गई है। यह मामला अब उन पुराने जख्मों को भी सामने ला रहा है जिन्हें वर्षों तक दबाकर रखा गया।

किस्तुड़ निवासी श्रीमती निर्मला चौहान ने हाल ही में सोशल मीडिया के माध्यम से अपने साथ हो रहे कथित मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न का मुद्दा उठाया था। उन्होंने यह भी आशंका जताई थी कि यदि उनके या उनके परिवार के साथ कोई अनहोनी होती है तो इसकी जिम्मेदारी क्षेत्रीय विधायक Pritam Singh की होगी।

यह मामला इतना गंभीर हो गया कि इसे उत्तराखंड विधानसभा में भी उठाया गया। विधायक प्रीतम सिंह ने सदन में कहा कि उन पर लगाए गए आरोपों की जांच होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यदि वे दोषी पाए जाते हैं तो कार्रवाई की जाए और यदि आरोप झूठे साबित होते हैं तो महिला के खिलाफ मानहानि की कार्रवाई हो।

लेकिन इस पूरे विवाद के बीच एक और बड़ा खुलासा सामने आया है।

35 साल पुरानी कहानी फिर सामने…..!

किस्तुड़ गांव के ही एक परिवार ने अब अपनी चुप्पी तोड़ी है।
इस परिवार का नाम “भेखियेऊ” बताया जा रहा है।

परिवार का दावा है कि लगभग 35 साल पहले, 1990 के आसपास, उन्हें भी गांव के एक तथाकथित प्रभावशाली व्यक्ति के कारण शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न झेलना पड़ा था। उनका आरोप है कि लगातार दबाव और भय के माहौल के कारण उन्हें अंततः अपना पुश्तैनी घर और गांव छोड़ना पड़ा।

परिवार के लोगों का कहना है कि वर्षों तक उन्होंने यह दर्द अपने भीतर दबाए रखा। लेकिन जब निर्मला चौहान ने अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाई तो उन्हें भी लगा कि शायद अब सच सामने लाने का समय आ गया है।

उनका कहना है कि,

“जो आज निर्मला के साथ हो रहा है, वैसा ही हमारे साथ भी हुआ था।”

सोशल मीडिया पर भी बढ़ रहे आरोप….!

इस मामले में देव पवार नाम के एक व्यक्ति ने भी सोशल मीडिया पर आरोप लगाए हैं कि गांव में कुछ लोग दबाव और धमकी का माहौल बना रहे हैं।

स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि जिन लोगों पर धमकाने के आरोप लग रहे हैं, वे कथित तौर पर सत्ता से जुड़े या प्रभावशाली लोगों के करीबी बताए जा रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

बड़ा सवाल: विधायक की जिम्मेदारी क्या?….

यहां सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा होता है कि यदि किसी विधानसभा क्षेत्र में लोगों को खुलेआम धमकाया जा रहा है, उन्हें अपने पुश्तैनी घर छोड़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है, तो उस क्षेत्र के जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारी क्या बनती है?

लोकतंत्र में विधायक सिर्फ कानून बनाने वाले नहीं होते, बल्कि अपने क्षेत्र के लोगों की सुरक्षा और सम्मान के भी राजनीतिक संरक्षक माने जाते हैं। ऐसे में यदि लगातार आरोप सामने आ रहे हैं, तो केवल राजनीतिक बयान पर्याप्त नहीं माने जा सकते।

जांच क्यों जरूरी है?…..

इस पूरे मामले में तीन गंभीर पहलू सामने आते हैं।

एक महिला द्वारा उत्पीड़न और धमकी का आरोप।

35 साल पुराने उत्पीड़न का दावा करने वाला दूसरा परिवार।

स्थानीय स्तर पर डर और दबाव के माहौल की चर्चा।

इन परिस्थितियों में सच्चाई जानने का एकमात्र रास्ता निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच ही है।

यदि आरोप झूठे हैं तो यह भी सामने आना चाहिए ताकि किसी की छवि को अनावश्यक नुकसान न हो।
और यदि आरोपों में सच्चाई है, तो दोषियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

सच सामने आना ही चाहिए……!

किस्तुड़ का यह मामला अब केवल एक गांव का विवाद नहीं रह गया है। यह सवाल बन गया है कि क्या ग्रामीण इलाकों में आज भी प्रभावशाली लोगों के डर से लोग अपनी जमीन और घर छोड़ने को मजबूर होते हैं?

अब निगाहें सरकार और प्रशासन पर हैं।
क्योंकि न्याय तभी होगा जब सच सामने आएगा, चाहे वह किसी के पक्ष में हो या विपक्ष में।

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