जब कलम ने उठाई कलम, तो सच इतिहास बन गया।

पहलगाम की दर्दनाक घटना जो कभी सुर्खियों में थी और आज भी लोगों की स्मृतियों में जिंदा है। अब शब्दों के माध्यम से इतिहास का हिस्सा बन चुकी है। उस समय के एक चश्मदीद गवाह और सूचना अधिकारी द्वारा लिखी गई यह पुस्तक सिर्फ घटनाओं का विवरण नहीं, बल्कि सच्चाई, संवेदना और साहस का जीवंत दस्तावेज है।
एक वर्ष बाद जब इस घटना को कलमबद्ध किया गया, तो यह सिर्फ यादों को संजोने का प्रयास नहीं, बल्कि उन अनकहे पहलुओं को सामने लाने की पहल भी है, जिन्हें अक्सर समय की धूल ढक देती है। यह पुस्तक बताती है कि घटनाएं सिर्फ घटती नहीं हैं, वे समाज, व्यवस्था और इंसानियत पर गहरे सवाल भी छोड़ जाती हैं।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को पुस्तक की प्रति भेंट किया जाना इस बात का संकेत है कि यह रचना केवल साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि नीति-निर्माताओं और समाज के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ भी बन सकती है।
यह किताब न केवल अतीत को समझने का जरिया है, बल्कि भविष्य के लिए सबक भी देती है। कि संवेदनशीलता, सतर्कता और जवाबदेही किसी भी समाज की सबसे बड़ी ताकत होती है।


