धामी के गढ़ में भाजपा पर चोट, क्या कमजोर पड़ रही है मुख्यमंत्री की राजनीतिक पकड़?

ब्यूरों रिपोर्ट
उत्तराखंड की राजनीति में एक सवाल अब खुलकर पूछा जाने लगा है कि क्या मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की राजनीतिक ताकत उतनी मजबूत है, जितनी दिखाई जाती है, या फिर उसकी चमक धीरे-धीरे फीकी पड़ रही है?
मुख्यमंत्री धामी के विधानसभा क्षेत्र चंपावत में नगर निकाय चुनाव में भाजपा समर्थित अध्यक्ष प्रत्याशी की हार ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। विपक्ष इसे मुख्यमंत्री के नेतृत्व पर जनता के अविश्वास के रूप में पेश कर रहा है, जबकि भाजपा इसे स्थानीय कारणों का परिणाम बता रही है। लेकिन राजनीति में हार का संदेश अक्सर जीत से ज्यादा दूर तक जाता है।
धामी पहले भी खटीमा विधानसभा सीट से चुनाव हार चुके हैं। उस समय भाजपा ने केंद्रीय नेतृत्व के भरोसे को प्राथमिकता दी और उन्हें मुख्यमंत्री पद पर बनाए रखा। बाद में चंपावत सीट खाली कराकर उन्हें विधानसभा पहुंचाया गया। तब इसे धामी के प्रति केंद्रीय नेतृत्व के विशेष विश्वास के रूप में देखा गया था।
लेकिन अब सवाल उठ रहा है कि क्या धामी की राजनीतिक ताकत संगठन की ताकत है या फिर उनकी अपनी व्यक्तिगत लोकप्रियता भी उतनी ही मजबूत है?
यदि मुख्यमंत्री अपने ही विधानसभा क्षेत्र में भाजपा प्रत्याशी को जीत नहीं दिला पा रहे हैं तो यह केवल एक स्थानीय चुनावी हार नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संकेत भी माना जाएगा। आखिर जिस क्षेत्र को मुख्यमंत्री का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता है, वहां भाजपा को झटका क्यों लगा?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इसके पीछे कई वजहें हो सकती हैं।
• स्थानीय कार्यकर्ताओं की नाराजगी
• टिकट वितरण में असंतोष
• गुटबाजी और अंदरूनी खींचतान
• स्थानीय मुद्दों पर जनता की नाराजगी
• सत्ता और संगठन के बीच बढ़ती दूरी
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उत्तराखंड में भाजपा की राजनीति लंबे समय से केंद्रीय नेतृत्व के प्रभाव के इर्द-गिर्द घूमती रही है। ऐसे में विपक्ष लगातार यह सवाल उठा रहा है कि क्या धामी अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक जमीन पर खड़े नेता हैं या फिर केंद्रीय नेतृत्व की कृपा से सत्ता में बने हुए हैं?
यह सवाल इसलिए भी उठता है क्योंकि उत्तराखंड में कई ऐसे मुख्यमंत्री हुए जिन्होंने सत्ता तो संभाली, लेकिन जनता के बीच अपना स्वतंत्र राजनीतिक आधार मजबूत नहीं कर पाए। अब राजनीतिक विरोधी धामी को भी उसी श्रेणी में रखने की कोशिश कर रहे हैं।
हालांकि किसी एक नगर निकाय चुनाव के नतीजे से किसी मुख्यमंत्री की लोकप्रियता को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि राजनीति में छोटे चुनाव बड़े संदेश छोड़ जाते हैं।
चंपावत की यह हार भाजपा और मुख्यमंत्री धामी दोनों के लिए चेतावनी का संकेत है। यह संदेश है कि केवल सरकारी योजनाओं, घोषणाओं और प्रचार से चुनाव नहीं जीते जाते। जनता का भरोसा बूथ तक पहुंचना चाहिए और कार्यकर्ता का उत्साह मतदान केंद्र तक दिखाई देना चाहिए।
फिलहाल धामी के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता को साबित करना है। क्योंकि राजनीति में सबसे कठिन लड़ाई विरोधियों से नहीं, बल्कि अपनी छवि और जनाधार को बचाए रखने की होती है।
चंपावत के नतीजों ने एक सवाल छोड़ दिया है।
क्या यह सिर्फ एक स्थानीय हार है, या फिर उत्तराखंड की राजनीति में धामी युग की पहली बड़ी चेतावनी?
इसका जवाब आने वाले चुनाव देंगे, लेकिन इतना तय है कि मुख्यमंत्री के गढ़ से निकला यह राजनीतिक संदेश देहरादून से दिल्ली तक जरूर सुना जाएगा।



