उत्तराखंड

पहाड़ की मजदूरी, नेटवर्क की सच्चाई और केंद्र-राज्य की जिम्मेदारी….!

ब्यूरों रिपोर्ट

चकराता और कालसी ब्लॉक के पहाड़ी इलाकों में पिछले 18 दिनों से 227 ग्राम प्रधान और 80 क्षेत्र पंचायत सदस्य धरने पर बैठे हुए हैं। उनका विरोध ‘विकसित भारत जी राम जी योजना’ (VB-G Ram G Yojana) के तहत लगाई जा रही ऑनलाइन हाजिरी के खिलाफ है।

ये क्षेत्र इतने दुर्गम हैं कि नेटवर्क की समस्या रोजमर्रा की हकीकत है। मजदूर काम पर आता है, लेकिन ऑनलाइन हाजिरी न लग पाने के कारण उसकी मजदूरी अटक जाती है। परिवारों में भूख और गुस्सा दोनों बढ़ रहा है। महिलाएं भी बड़ी संख्या में इस धरने में शामिल हैं। कई महिलाएं खुद ग्राम पंचायत की प्रधान हैं।

समस्या की जड़…!

जी राम जी योजना केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी पहल है, जो मनरेगा की जगह ले रही है। इसमें पारदर्शिता बढ़ाने, भ्रष्टाचार रोकने और बेहतर मॉनिटरिंग के लिए ऑनलाइन उपस्थिति (digital attendance) को अनिवार्य बनाया गया है। योजना का मकसद सराहनीय है मजदूरों को समय पर मजदूरी मिले, फर्जी हाजिरी बंद हो और विकास कार्यों में जवाबदेही आए।

लेकिन कार्यान्वयन में गंभीर खामी दिख रही है…!

केंद्र सरकार (Ministry of Rural Development) अभी पूरे उत्तराखंड में जी राम जी योजना को पूरी तरह लागू नहीं कर पाई है।

जो काम हो रहा है, वह अभी भी मनरेगा के तहत ही है।
मनरेगा में इन दोनों ब्लॉकों में ऑफलाइन हाजिरी का प्रावधान था, जिससे मजदूरी समय पर खातों में आ जाती थी।

अब जिला स्तर के अधिकारी मनरेगा के कामों में भी ऑनलाइन हाजिरी जबरन लागू कर रहे हैं।

नतीजा- पहाड़ी मजदूर काम करता है, लेकिन सिग्नल न होने के कारण हाजिरी नहीं लगती। नतीजा- मजदूरी रुक जाती है।

केंद्र और राज्य की जिम्मेदारी….!

केंद्र सरकार की जिम्मेदारी,
नई योजना लाकर पारदर्शिता लाना केंद्र का अधिकार और कर्तव्य है। लेकिन योजना को जमीनी हकीकत से जोड़ना भी उसी का काम है। दुर्गम हिमालयी क्षेत्रों में जहां नेटवर्क अभी भी अनिश्चित है, वहां पूर्ण डिजिटल अनिवार्यता लागू करने से पहले विकल्प (ऑफलाइन मोड, बैकअप सिस्टम या ग्रेस पीरियड) रखना चाहिए। अगर केंद्र योजना का पूरा खाका तैयार कर रहा है, तो उसे राज्यों की भौगोलिक विविधता को ध्यान में रखना होगा।

राज्य सरकार (उत्तराखंड धामी सरकार) की जिम्मेदारी..
कार्यान्वयन राज्य का काम है। उत्तराखंड सरकार ने केंद्र को बताया था कि पूरे राज्य में हर गांव को मोबाइल नेटवर्क से जोड़ दिया गया है (राज्य में 96%+ गांवों में 4G कवरेज का दावा किया जाता है)। लेकिन चकराता-कालसी जैसे क्षेत्रों की ग्रामीण जनता और चुने हुए प्रतिनिधि कह रहे हैं कि नेटवर्क की समस्या आज भी बनी हुई है।

यहां दो सवाल उठते हैं..?

1- क्या राज्य सरकार का दावा और जमीनी स्थिति में बड़ा अंतर है?

2- या फिर कुछ इलाके अभी भी कवरेज से बाहर हैं, जिन्हें सुधारने में देरी हो रही है?

ये 307 चुने हुए जनप्रतिनिधि (प्रधान और क्षेत्र पंचायत सदस्य) जनता द्वारा ही चुने गए हैं। उन्होंने जिलाधिकारी, राज्य के मंत्रियों और केंद्र के सांसदों तक ज्ञापन दिए हैं। इतनी बड़ी संख्या में महिलाओं का शामिल होना इस समस्या की गंभीरता को भी दिखाता है।

आगे क्या?…

पहाड़ में मजदूर का एक दिन का काम भी उसके परिवार के लिए बहुत मायने रखता है। अगर ऑनलाइन सिस्टम मजदूरी देने में बाधा बन रहा है, तो तत्काल सुधार जरूरी है।

केंद्र को अपनी योजना में हिमालयी राज्यों के लिए स्पेशल प्रावधान (relaxation in digital attendance) रखना चाहिए।

राज्य सरकार को नेटवर्क की असल स्थिति का सही आकलन कर केंद्र को रिपोर्ट करना चाहिए और जहां समस्या है, वहां तुरंत टावर, सैटेलाइट या वैकल्पिक व्यवस्था करनी चाहिए।

दोनों सरकारों को मिलकर ऐसे हाइब्रिड मॉडल पर काम करना चाहिए, जिसमें पारदर्शिता बनी रहे और आम मजदूर का हक भी न छिने।

धरना करने वाले प्रधान और सदस्य कह रहे हैं। “हमारा विरोध योजना के खिलाफ नहीं, बल्कि व्यवहारिक समस्या के खिलाफ है।”

अगर केंद्र और राज्य दोनों अपनी-अपनी जिम्मेदारी सही से निभाएं, तो जी राम जी योजना वाकई ग्रामीणों के लिए वरदान साबित हो सकती है। लेकिन फिलहाल पहाड़ के इन गांवों में मजदूर सिर्फ एक चीज मांग रहा है। काम के बदले समय पर मजदूरी।

नेटवर्क की सच्चाई को नजरअंदाज करके न तो पारदर्शिता आएगी, न विकास। दोनों सरकारों को अब समन्वय और संवेदनशीलता दिखानी होगी, वरना यह असंतोष आगे चुनावी मैदान तक भी पहुंच सकता है।

दोनों सरकारों से अपील है कि इस मुद्दे पर तुरंत संज्ञान लेकर जमीनी समाधान निकालें।

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