जिस दर्द पर जनता साथ खड़ी हुई, क्या वह एक फोटो में सिमट गया?

ब्यूरों रिपोर्ट, देहरादून
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री से सीधा और असहज सवाल…
जिस पत्रकार हेम भट्ट को आज मुख्यमंत्री आवास बुलाकर मुस्कुराते हुए फोटो खिंचवाई जा रही है, क्या वही हेम भट्ट नहीं हैं जिन्हें आपकी पुलिस उनके छह महीने की मासूम बच्ची और सात साल के बेटे के सामने सुबह चार बजे घर से घसीटते हुए ले गई थी?
क्या उस वक्त किसी अदालत का वारंट था?
क्या कोई समन दिया गया था?
क्या गिरफ्तारी की कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया था?
अगर नहीं, तो उन पुलिस अधिकारियों पर आज तक क्या कार्रवाई हुई?
धाकड़ धामी जी, क्या एक फोटो से किसी नागरिक के संवैधानिक अधिकारों का हनन धुल जाता है?
क्या कैमरे की एक मुस्कान पुलिसिया ज्यादती का प्रायश्चित बन सकती है?
और सवाल हेम भट्ट जी से भी है…
जिस अन्याय की कहानी सुनाकर आपने पूरे प्रदेश की सहानुभूति बटोरी, जिस घटना को लोकतंत्र पर हमला बताया गया, वह सब मुख्यमंत्री आवास की एक तस्वीर के सामने इतनी जल्दी कैसे बौना पड़ गया?
क्या परिवार के साथ हुए कथित अत्याचार की पीड़ा इतनी अल्पकालिक थी?
या फिर सत्ता के दरबार तक पहुंचने का रास्ता पहले से तय था?
संघर्ष की सबसे बड़ी ताकत उसकी गरिमा होती है। सत्ता से सवाल पूछने वाले जब सत्ता के साथ तस्वीरों में सिमट जाएं, तो सवाल सिर्फ सरकार पर नहीं, सवाल उस संघर्ष की विश्वसनीयता पर भी उठते हैं।
जनता आखिर यह जानना चाहती है कि न्याय हुआ है या सिर्फ एक फोटोशूट?

