किताबों का खेल या शिक्षा का व्यापार? उत्तराखंड में स्कूलों की मनमानी पर उठे सवाल।

ब्यूरों रिपोर्ट
उत्तराखंड में शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। केंद्र सरकार और NCERT की स्पष्ट मंशा है कि देशभर के स्कूलों, चाहे निजी हों या सरकारी में एक समान और सस्ती शिक्षा के लिए एनसीईआरटी की किताबें लागू की जाएं। लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट दिखाई दे रही है।
प्रदेश के कई निजी स्कूलों में शिक्षा अब “सेवा” नहीं, बल्कि “व्यापार” बनती जा रही है। अभिभावकों का आरोप है कि स्कूल प्रशासन खुलेआम प्राइवेट पब्लिशर्स की महंगी किताबें थोप रहा है। हालत यह है कि एक ही कक्षा के लिए हजारों रुपये की किताबें खरीदना मजबूरी बन गई है, जबकि एनसीईआरटी की सस्ती किताबें दरकिनार कर दी गई हैं।
यही नहीं, स्कूलों की मनमानी यहीं तक सीमित नहीं है। यूनिफॉर्म को लेकर भी अभिभावकों को एक तय दुकान से ही खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है। यदि कोई अभिभावक बाजार से कपड़ा खरीदकर यूनिफॉर्म सिलवाता है, तो उसे स्कूल में मान्यता नहीं दी जाती।
यानी शिक्षा के नाम पर हर स्तर पर एक सुनियोजित “नेटवर्क” काम कर रहा है, जिसमें अभिभावक खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं।
इस पूरे मामले को छात्र नेता कमलेश भट्ट ने गंभीरता से उठाया। वे विकासनगर स्थित खंड शिक्षा कार्यालय पहुंचे, ताकि इस मुद्दे पर जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब लिया जा सके। लेकिन यहां भी सिस्टम की उदासीनता साफ नजर आई। खंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय में मौजूद नहीं थीं।
कार्यालय में मौजूद कर्मचारियों ने बताया कि अधिकारी देहरादून में ड्यूटी पर हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब अभिभावक और छात्र समस्याओं से जूझ रहे हैं, तब जिम्मेदार अधिकारी आखिर कहां हैं? और सबसे बड़ा सवाल? क्या सरकार के आदेश सिर्फ कागजों तक ही सीमित रहेंगे?
अब देखना होगा कि सरकार इस “शिक्षा के खेल” पर लगाम कसती है या फिर अभिभावक यूं ही इस सिस्टम के बोझ तले दबे रहेंगे।
