उत्तराखंड

जब अपनी ही ज़मीन पर आवाज़ दबे, जौनसारी भाषा के साथ ये कैसा सरकारी अन्याय?….

विशेष रिपोर्ट / “पहाड़ का सच”

उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान उसकी भाषाई विविधता में बसती है। गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी ये सिर्फ बोलियां नहीं, बल्कि पहाड़ की आत्मा हैं। लेकिन सवाल तब खड़ा होता है, जब इन्हीं में से एक आवाज़ को सरकारी मंच से ही खामोश कर दिया जाए।

देहरादून स्थित दूरदर्शन देहरादून ने हाल ही में क्षेत्रीय भाषाओं में समाचार वाचन के लिए विज्ञप्ति जारी की। उम्मीद थी कि इसमें उत्तराखंड की सभी प्रमुख भाषाओं को समान सम्मान मिलेगा। लेकिन हैरानी की बात ये रही कि इस विज्ञापन में जौनसारी भाषा का कहीं कोई ज़िक्र ही नहीं।

क्या जौनसार-बावर इस प्रदेश का हिस्सा नहीं?

क्या वहां के लोगों का टैक्स इस सरकारी संस्थान में नहीं लगता?

जबकि यही सरकार, खुद मन की बात जैसे मंच से क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन की बात करती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार अपने संबोधनों में लोकभाषाओं को देश की ताकत बता चुके हैं।

फिर आखिर क्यों जौनसारी भाषा को बार-बार नजरअंदाज किया जा रहा है?

सिर्फ दूरदर्शन ही नहीं, आकाशवाणी में भी यही तस्वीर देखने को मिलती है।  गढ़वाली और कुमाऊनी को जगह, लेकिन जौनसारी के हिस्से में सन्नाटा।

बड़ा सवाल:  क्या देहरादून के इन सरकारी दफ्तरों में बैठे अधिकारी अपनी व्यक्तिगत कुंठा और संकीर्ण मानसिकता के चलते जौनसारी भाषा के साथ भेदभाव कर रहे हैं?

अगर हां, तो ये सिर्फ एक भाषा का नहीं, बल्कि पूरे जौनसार-बावर की अस्मिता का अपमान है।

अब कार्रवाई का वक्त….

केन्द्र सरकार, खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अब सीधा सवाल है कि,

क्या ऐसे अधिकारियों पर तुरंत कार्रवाई होगी?

क्या जौनसारी भाषा को उसका हक मिलेगा?

अगर “सबका साथ, सबका विकास” सिर्फ नारा नहीं, हकीकत है, तो जौनसारी भाषा को भी बराबरी का मंच मिलना ही चाहिए।

सरकारी संस्थानों में बैठकर अगर अधिकारी ही भेदभाव की दीवार खड़ी करेंगे, तो फिर आम जनता न्याय की उम्मीद किससे करेगी?

अब वक्त है।

जवाबदेही तय हो

भेदभाव खत्म हो

और जौनसारी भाषा को उसका सम्मान मिले।

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