स्मार्ट स्कूलों का सपना और जमीनी सच्चाई।

ब्यूरों रिपोर्ट
देशभर में Ministry of Education की पीएम श्री योजना के तहत सरकारी स्कूलों को आधुनिक बनाने की बड़ी मुहिम चलाई जा रही है। स्मार्ट क्लास, डिजिटल बोर्ड, हाईटेक लैब, रंगीन भवन, आकर्षक फर्नीचर और करोड़ों रुपये की लागत से तैयार हो रहे “मॉडल स्कूल” यह तस्वीर सुनने और देखने में बेहद शानदार लगती है।
भवन चमक रहे हैं, लेकिन शिक्षा व्यवस्था क्यों लड़खड़ा रही है?
सरकारें दावा कर रही हैं कि सरकारी स्कूल अब निजी स्कूलों को टक्कर देंगे। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल दीवारों को चमका देने से शिक्षा व्यवस्था सुधर जाएगी?
क्या स्मार्ट बोर्ड अपने आप बच्चों को पढ़ा देंगे?
क्या खाली पदों पर डिजिटल स्क्रीन पढ़ाएंगी?
और जब शिक्षक ही स्कूल में नहीं होंगे, तो “स्मार्ट स्कूल” आखिर किसके लिए बन रहे हैं?
सबसे बड़ा संकट, शिक्षकों का अभाव।
देश के अनेक सरकारी स्कूल आज भी शिक्षकों की भारी कमी से जूझ रहे हैं। कहीं गणित का शिक्षक नहीं, कहीं विज्ञान का। कई स्कूल एक या दो शिक्षकों के भरोसे पूरी व्यवस्था चला रहे हैं।
प्राथमिक विद्यालयों से लेकर इंटर कॉलेजों तक हजारों पद खाली पड़े हैं। अनेक विद्यालयों में कला, विज्ञान और वाणिज्य जैसे विषयों के नियमित शिक्षक तक उपलब्ध नहीं हैं।
विडंबना देखिए,
एक ओर करोड़ों रुपये भवनों और डिजिटल उपकरणों पर खर्च किए जा रहे हैं, दूसरी ओर बच्चों को पढ़ाने वाले शिक्षक ही पर्याप्त संख्या में मौजूद नहीं हैं।
शिक्षक पढ़ाएं या सरकार के दूसरे काम करें?
जो शिक्षक उपलब्ध हैं, उनकी स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है।
सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को वर्षों से शिक्षा के अतिरिक्त कार्यों में लगातार लगाया जाता रहा है।
जनगणना
वोटर लिस्ट पुनरीक्षण
चुनाव ड्यूटी
सर्वे अभियान
सरकारी योजनाओं का डाटा संग्रह
राशन, परिवार और सामाजिक सर्वेक्षण
अब एक बार फिर जनगणना की तैयारियों में बड़ी संख्या में शिक्षकों की ड्यूटी लगाई जा रही है।
सवाल सीधा है कि,
जब शिक्षक घर-घर जाकर जनगणना करेंगे, तो स्कूल में बच्चों को कौन पढ़ाएगा?
सरकारें शिक्षा को प्राथमिकता बताती हैं, लेकिन व्यवहार में शिक्षक सबसे आसान “मल्टीटास्किंग सरकारी कर्मचारी” बना दिए गए हैं।
एक शिक्षक जो कक्षा में होना चाहिए, वह कभी टैबलेट पर डाटा भर रहा होता है, कभी बूथ स्तर अधिकारी बनकर मतदाता सूची सुधार रहा होता है।
शिक्षा का मूल संकट भवन नहीं, व्यवस्था है।
सरकारें अक्सर स्कूलों की रंगाई-पुताई और डिजिटल उपकरणों को शिक्षा सुधार का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत करती हैं। लेकिन शिक्षा विशेषज्ञ लंबे समय से कहते रहे हैं कि शिक्षा की गुणवत्ता का आधार तीन चीजें हैं।
योग्य शिक्षक
नियमित शिक्षण
जवाबदेह शैक्षणिक व्यवस्था
यदि यही तीनों कमजोर हों, तो स्मार्ट क्लास केवल “फोटो और प्रचार” का माध्यम बनकर रह जाती है।
सरकारी स्कूलों से क्यों टूट रहा है भरोसा?
सरकारी स्कूलों की इन्हीं अव्यवस्थाओं से परेशान होकर मध्यम और निम्न आय वर्ग के माता-पिता भी अब निजी स्कूलों की ओर भाग रहे हैं।
उन्हें लगता है कि चाहे फीस देनी पड़े, लेकिन बच्चे की पढ़ाई तो नियमित होगी।
लेकिन यहां एक और बड़ी समस्या खड़ी हो जाती है, निजी स्कूलों का बढ़ता व्यावसायीकरण।
प्राइवेट स्कूल: शिक्षा या खुला बाजार?
आज अनेक निजी स्कूल शिक्षा से ज्यादा “ब्रांड” बन चुके हैं।
अभिभावकों पर दबाव बनाया जाता है कि,
किताबें केवल तय दुकान से खरीदें
स्कूल ड्रेस केवल निर्धारित विक्रेता से लें
महंगी कॉपियां, बैग और जूते अनिवार्य हों
हर वर्ष नया पैटर्न खरीदना पड़े।
परिणाम यह है कि एक सामान्य परिवार की आय का बड़ा हिस्सा केवल बच्चों की शिक्षा पर खर्च हो रहा है।
शिक्षा अब अधिकार कम और आर्थिक बोझ अधिक बनती जा रही है।
सबसे ज्यादा पिस रहा है आम परिवार।
एक तरफ सरकारी स्कूलों में भरोसे का संकट, दूसरी तरफ निजी स्कूलों की महंगी व्यवस्था।
बीच में फंसा है देश का आम नागरिक,
जो अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा देना चाहता है, लेकिन या तो उसे कमजोर सरकारी व्यवस्था मिलती है या फिर महंगी निजी शिक्षा का दबाव।
सरकारों से बड़े सवाल
यह समय केवल स्मार्ट बोर्ड लगाने का नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की बुनियादी सच्चाई स्वीकार करने का है।
केंद्र और राज्य सरकारों से कुछ सीधे सवाल पूछे जाने चाहिए कि,
क्या बिना पर्याप्त शिक्षकों के स्मार्ट स्कूल सफल हो सकते हैं?
शिक्षा विभाग के शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में क्यों झोंका जाता है?
यदि जनगणना और चुनाव जरूरी हैं, तो उनके लिए अलग कैडर क्यों नहीं?
सरकारी स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई सुनिश्चित करने की वास्तविक योजना क्या है?
निजी स्कूलों की मनमानी फीस और व्यापारिक गतिविधियों पर नियंत्रण कब होगा?
शिक्षा सुधार की असली शुरुआत कहाँ से होगी?
देश को केवल “स्मार्ट स्कूल” नहीं, बल्कि “स्मार्ट शिक्षा व्यवस्था” चाहिए।
जब तक कि,
हर स्कूल में पर्याप्त शिक्षक नहीं होंगे,
शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों से मुक्त नहीं किया जाएगा,
सरकारी स्कूलों में जवाबदेही नहीं बढ़ेगी,
और निजी स्कूलों की मनमानी पर नियंत्रण नहीं होगा,
तब तक करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद शिक्षा व्यवस्था का संकट बना रहेगा।
चमकती इमारतें कैमरे में अच्छी दिख सकती हैं,
लेकिन राष्ट्र का भविष्य केवल दीवारों से नहीं, कक्षा में खड़े शिक्षक से बनता है।


