चकराता की चुप्पी और पाँचवीं अनुसूची का सवाल: जब ‘अपने’ नेता भी मौन हो जाएँ।

ब्यूरों रिपोर्ट, विक्रम सिंह।
चकराता-जौनसार बाबर।
जहाँ जौनसारी जनजाति की आबादी दशकों से घनी बसी है। जहाँ ब्रिटिश काल से ही विशेष प्रशासनिक व्यवस्थाएँ रही हैं। जहाँ भूमि, जल और जंगल पर पारंपरिक अधिकार आज भी जिंदा हैं। और जहाँ संविधान की पाँचवीं अनुसूची में शामिल होने की मांग बार-बार उठती रही है।
फिर भी इस बड़े संवैधानिक सवाल पर क्षेत्र के दो सबसे प्रभावशाली चेहरे भाजपा विधायक मुन्ना सिंह चौहान और कांग्रेस विधायक प्रीतम सिंह लगभग पूरी तरह चुप हैं।
दोनों नेता इसी मिट्टी से निकले हैं। मुन्ना सिंह चौहान ने 1991 और 1996 में चकराता से प्रतिनिधित्व किया है, और प्रीतम सिंह 2002 से लगातार चकराता (एसटी) सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। दशकों तक उन्होंने जौनसारी समुदाय का प्रतिनिधित्व किया। लेकिन सार्वजनिक रिकॉर्ड, विधानसभा की कार्रवाई और उपलब्ध बयानों में पाँचवीं अनुसूची की ठोस वकालत का कोई ठोस निशान नहीं मिलता। न कोई उल्लेखनीय प्रस्ताव, न लंबी बहस, न लगातार अभियान।
यह चुप्पी सिर्फ राजनीतिक नहीं, संवैधानिक भी है।
पाँचवीं अनुसूची क्या देती है?…..
पाँचवीं अनुसूची आदिवासी बहुल क्षेत्रों को विशेष सुरक्षा देती है। भूमि हस्तांतरण पर कड़ी पाबंदी, स्थानीय शासन में ज्यादा अधिकार, विकास योजनाओं में प्राथमिकता और सांस्कृतिक संरक्षण। यह सिर्फ कागजी सुविधा नहीं, बल्कि जल-जंगल-जमीन पर नियंत्रण का संवैधानिक ढाल है। उत्तराखंड के कई पर्वतीय क्षेत्रों में यह मांग लंबे समय से चल रही है, लेकिन चकराता जैसे स्पष्ट रूप से जनजाति बहुल और कॉम्पैक्ट क्षेत्र के लिए संभावना अपेक्षाकृत बेहतर मानी जाती है।
क्यों? क्योंकि यहाँ जौनसारी आबादी कई जगहों पर 50 प्रतिशत के आसपास या उससे अधिक है। Dhebar Commission के मानदंडों में आदिवासी आबादी की प्रबलता, क्षेत्र का कॉम्पैक्ट आकार, अविकसित प्रकृति और प्रशासनिक व्यवहार्यता जैसे बिंदु यहाँ आसानी से पूरे होते दिखते हैं। ब्रिटिश काल के Scheduled Districts, Excluded Areas और बाजिब-उल-अर्ज व्यवस्था का इतिहास भी प्रस्ताव को मजबूत बनाता है। राज्य भूमि कानून के तहत ST भूमि हस्तांतरण पर पहले से प्रतिबंध है। यह भी एक सकारात्मक आधार है।
प्रक्रिया क्या है?….
संविधान की पाँचवीं अनुसूची के पैराग्राफ 6 के अनुसार राष्ट्रपति किसी क्षेत्र को ‘अनुसूचित क्षेत्र’ घोषित कर सकते हैं। राज्य के राज्यपाल से परामर्श अनिवार्य है। संसद की मंजूरी की जरूरत नहीं। लेकिन व्यावहारिक रूप से रास्ता लंबा है।
1- मजबूत प्रस्ताव तैयार करना…जनसंख्या आँकड़े, नक्शा, खसरा नंबर, ऐतिहासिक दस्तावेज, आर्थिक पिछड़ेपन के आँकड़े और ग्राम सभाओं के प्रस्ताव।
2- जनजातीय सलाहकार परिषद (TAC) से सिफारिश लेना।
3- राज्य सरकार और विधानसभा का समर्थन जुटाना।
4- राज्यपाल के माध्यम से केंद्र के जनजातीय मामलों के मंत्रालय को प्रस्ताव भेजना।
5- अंत में राष्ट्रपति का आदेश।
स्थानीय ग्राम सभाओं से प्रस्ताव, NCST को याचिका, सांसद-विधायकों के जरिए दबाव और शांतिपूर्ण जन-आंदोलन ये सब प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकते हैं। लेकिन सबसे जरूरी है राजनीतिक इच्छाशक्ति।
सवाल सीधे हैं…..!
जब दोनों नेता ‘अपने क्षेत्र’ और ‘अपने समुदाय’ की बात करते हैं, तो इस दीर्घकालिक संवैधानिक मुद्दे पर उनकी सक्रियता क्यों लगभग शून्य रही? क्या यह मुद्दा कभी उनके एजेंडे में प्राथमिकता नहीं रहा? और क्यों…
जनता अब सिर्फ चुनावी नारों से संतुष्ट नहीं है। चकराता और जौनसार बाबर के लोग जानना चाहते हैं कि उनके ‘अपने’ नेताओं ने इस दिशा में ठोस क्या किया। फिलहाल उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड का जवाब साफ है, लगभग कुछ नहीं।
पाँचवीं अनुसूची कोई जादुई छड़ी नहीं है। लेकिन चकराता जैसे क्षेत्र के लिए यह मांग पूरे उत्तराखंड की तुलना में ज्यादा व्यावहारिक और संभावित है। बशर्ते इसे दस्तावेजी, एकजुट और लगातार तरीके से आगे बढ़ाया जाए। मजबूत प्रस्ताव, TAC की सिफारिश, विधानसभा का संकल्प और राज्य सरकार का औपचारिक समर्थन, यही सबसे प्रभावी रास्ता है।
अब सवाल यह है कि क्या चकराता क्षेत्र के नेता इस चुप्पी को तोड़ेंगे? या फिर यह मांग एक और लंबित फाइल बनकर रह जाएगी?
चकराता इंतजार कर रहा है।



