नारी शक्ति को इंतज़ार कब तक? महिला आरक्षण पर सियासत तेज, विकासनगर से उठा बड़ा सवाल…।

ब्यूरों रिपोर्ट
विकासनगर/देहरादून
विकासनगर के एक निजी होटल में भाजपा महिला मोर्चा द्वारा आयोजित पत्रकार वार्ता में महिला आरक्षण के मुद्दे पर राजनीतिक माहौल गरमा गया। पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष मधू चौहान ने प्रेस को संबोधित करते हुए नारी शक्ति वंदनम बिल को लेकर विपक्ष पर तीखा हमला बोला और इसे देश की आधी आबादी के साथ “राजनीतिक अन्याय” बताया।
उन्होंने कहा कि नारी शक्ति वंदनम बिल (महिला आरक्षण बिल), जिसे वर्ष 2023 में संसद से पारित किया गया, महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा में 33% आरक्षण देने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। लेकिन इसका वास्तविक क्रियान्वयन जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया से जुड़ा होने के कारण अभी अधर में है। केंद्र सरकार ने इसे 2029 के लोकसभा चुनाव तक लागू करने का लक्ष्य रखा था।
मधू चौहान ने दावा किया कि जब इस बिल को लेकर संसद में चर्चा हो रही थी, तब प्रधानमंत्री ने विपक्ष से अपील की थी कि वे चाहें तो इसका पूरा श्रेय ले लें, लेकिन देश की महिलाओं के हक में इस विधेयक को पास कर दें। उनके अनुसार, “यह बिल किसी पार्टी का नहीं, बल्कि देश की आधी आबादी का अधिकार है।”
हालांकि, उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष ने इस मुद्दे पर गंभीरता नहीं दिखाई और महिलाओं के प्रतिनिधित्व के सवाल को राजनीति की भेंट चढ़ा दिया। चौहान ने यह भी कहा कि विपक्ष के इस रवैये से देश की महिलाओं में गहरी नाराजगी है।
कब से चल रहा है महिला आरक्षण का इंतज़ार?
महिला आरक्षण का मुद्दा कोई नया नहीं है। इसकी जड़ें लगभग तीन दशक पुरानी हैं।
1996: पहली बार महिला आरक्षण बिल संसद में पेश किया गया।
2010: राज्यसभा में यह बिल पास हुआ, लेकिन लोकसभा में अटक गया और अंततः निरस्त हो गया।
2023: लंबे इंतजार के बाद “नारी शक्ति वंदनम अधिनियम” के रूप में इसे दोबारा संसद में पारित किया गया।
यानी करीब 27 सालों से देश की महिलाएं राजनीतिक भागीदारी के अपने अधिकार का इंतजार कर रही हैं।
अब क्यों लटका है लागू होना?
बिल के प्रावधानों के अनुसार, इसे लागू करने के लिए दो अहम प्रक्रियाएं जरूरी हैं।
नई जनगणना।
उसके आधार पर परिसीमन (सीटों का पुनर्निर्धारण)
जब तक ये दोनों प्रक्रियाएं पूरी नहीं होतीं, तब तक आरक्षण लागू नहीं हो सकता। यही वजह है कि यह ऐतिहासिक कानून पास होने के बावजूद ज़मीन पर उतरने का इंतजार कर रहा है।
जनाक्रोश रैली का ऐलान…
इस मुद्दे को लेकर भाजपा महिला मोर्चा अब आक्रामक रुख में है। मधू चौहान ने बताया कि 24 अप्रैल को देहरादून में “जनाक्रोश रैली” आयोजित की जाएगी, जिसके माध्यम से भाजपा विपक्ष के “दोहरे चरित्र” को जनता के सामने लाने का प्रयास करेगी।
उन्होंने कहा कि पार्टी घर-घर जाकर महिलाओं को जागरूक करेगी कि किस तरह उनके अधिकारों को राजनीतिक कारणों से रोका गया।
राजनीति बनाम अधिकार…
महिला आरक्षण का मुद्दा अब केवल विधायी प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का केंद्र बन चुका है। एक तरफ सरकार इसे ऐतिहासिक उपलब्धि बता रही है, तो वहीं विपक्ष इसके लागू होने में देरी को मुद्दा बना सकता है।
देश की आधी आबादी के प्रतिनिधित्व का सवाल आज भी जवाब तलाश रहा है। कानून बन चुका है, लेकिन लागू होने की राह अभी भी लंबी है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि,
“नारी शक्ति को उसका हक आखिर कब मिलेगा?”
