क्या उत्तराखंड में जवाबदेही खत्म हो चुकी है?

ब्यूरों रिपोर्ट
देहरादून। उत्तराखंड आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां जनता का सबसे बड़ा सवाल विपक्ष से नहीं, बल्कि अपनी ही सरकार से है। सवाल यह नहीं कि विकास कार्य हो रहे हैं या नहीं, बल्कि यह है कि जो विकास हो रहा है, उसकी गुणवत्ता और जवाबदेही आखिर किसके भरोसे है?
देहरादून के प्रेमनगर-नंदा की चौकी पर लगभग 16 करोड़ रुपये की लागत से बना पुल उद्घाटन के कुछ ही दिनों में क्षतिग्रस्त हो जाता है। यह घटना केवल एक पुल की नहीं, बल्कि पूरे सरकारी तंत्र की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करती है। जनता पूछ रही है कि आखिर ऐसा कैसे हुआ? निर्माण से पहले गुणवत्ता की जांच किसने की? भुगतान किस आधार पर हुआ? और सबसे महत्वपूर्ण इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
उत्तराखंड में अक्सर देखने को मिलता है कि किसी बड़े मामले के सामने आने पर जांच के आदेश दे दिए जाते हैं, कुछ दिनों तक सुर्खियां बनती हैं और फिर मामला धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में चला जाता है। यदि इस बार भी ऐसा हुआ, तो यह संदेश जाएगा कि करोड़ों रुपये की सार्वजनिक परियोजनाओं में विफलता की भी कोई कीमत नहीं है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार पर विपक्ष लगातार प्रशासनिक ढिलाई और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण न रख पाने के आरोप लगाता रहा है। सरकार इन आरोपों को खारिज करती है, लेकिन केवल खंडन पर्याप्त नहीं है। जनता को जवाब चाहिए, कार्रवाई चाहिए और दोषियों की स्पष्ट जवाबदेही चाहिए।
सबसे बड़ा प्रश्न भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बार-बार भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर रुख अपनाने की बात कही है। ऐसे में उत्तराखंड में लगातार उठ रहे सवालों पर क्या राष्ट्रीय नेतृत्व की नजर नहीं पड़ रही? क्या प्रदेश में चल रही परियोजनाओं की गुणवत्ता और प्रशासनिक जवाबदेही की स्वतंत्र समीक्षा नहीं होनी चाहिए?
उत्तराखंड भाजपा के पास अनुभवी और सक्षम नेताओं की कमी नहीं है। इसलिए यह बहस भी स्वाभाविक है कि यदि प्रदेश में शासन और प्रशासन को लेकर लगातार गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं, तो संगठन और केंद्रीय नेतृत्व इस पर क्या सोच रहा है? लोकतंत्र में ऐसे प्रश्न पूछना जनता का अधिकार है और उनका उत्तर देना सरकार का दायित्व।
आज जरूरत किसी राजनीतिक नारे की नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई की है। यदि नंदा की चौकी पुल प्रकरण में किसी अधिकारी, इंजीनियर, ठेकेदार या एजेंसी की लापरवाही सामने आती है, तो कार्रवाई केवल औपचारिक नहीं बल्कि उदाहरण बनने वाली होनी चाहिए। तभी जनता का भरोसा लौटेगा।
उत्तराखंड की जनता ने हमेशा ईमानदार शासन की उम्मीद की है। अब समय आ गया है कि सरकार केवल विकास के दावे न करे, बल्कि यह भी साबित करे कि जनता के पैसे से बनने वाला हर पुल, हर सड़क और हर परियोजना गुणवत्ता, पारदर्शिता और जवाबदेही की कसौटी पर खरी उतरती है।
उत्तराखंड की आवाज अब दिल्ली तक पहुंचनी चाहिए। क्योंकि यह किसी एक पुल का नहीं, पूरे शासन तंत्र में जनता के विश्वास का प्रश्न है।
