हनोल महासू धाम में घांडुवा पर रोक आस्था की जड़ें और बदलाव की लहर।

ब्यूरों रिपोर्ट
देवभूमि के पहाड़ों में लोक-परंपराएं केवल रीति-रिवाज नहीं होतीं। वे सदियों से चली आ रही सामाजिक आस्था, सामूहिक स्मृति और जीवन-दर्शन का जीवंत प्रतीक हैं। जब इन परंपराओं में बदलाव आता है, तो केवल पूजा-पद्धति नहीं बदलती समाज की भावनाएं, विश्वास और पहचान भी हिल जाती हैं। जौनसार-बावर के इष्ट देव महासू महाराज के प्राचीन धाम हनोल में घांडुवा (जीवित बकरा) चढ़ाने की परंपरा पर लगने वाली रोक इसी सवाल को फिर से सामने ला रही है।
हनोल स्थित श्री महासू देवता मंदिर टौंस नदी के किनारे बसा, पांडवकालीन मान्यताओं और न्याय की आस्था का केंद्र है। महासू महाराज बौठा, बासिक, पबासिक और चालदा यहां न केवल पूजे जाते हैं, बल्कि विवादों के फैसले भी उन्हीं के दरबार में सुने जाते हैं। वर्षों से मनौती पूरी होने पर श्रद्धालु घांडुवा चढ़ाते आए है। पशुबलि 2010 में ही बंद हो चुकी थी। घांडुवा जीवित रहता है। अभिमंत्रित जल से “धूण” की जाती और माना जाता कि देवता ने स्वीकार कर लिया। ये बकरे मंदिर परिसर और गांव में घूमते नजर आते जो देवता का जीवित भंडार है।
समिति कह रही है कि अब देवता की आज्ञा के अनुसार यह परंपरा भी समाप्त कर दी गई है। बावर की छह खतों और बंगाण की तीन पट्टियों के कारिंदों, स्याणों, बजीरों और गणमान्य लोगों की बैठक में यह निर्णय लिया गया। मंदिर समिति ने स्पष्ट किया कि आने वाले दिनों में अब घांडुवा नहीं चढ़ेगा। विकल्प में जटा नारियल अर्पित किया जा सकेगा। घांडुवे के निर्धारित मूल्य या श्रद्धानुसार राशि मंदिर समिति कार्यालय में जमा कर रसीद ली जा सकेगी। 19 से 21 नवंबर की स्वर्ण कलश स्थापना के अनुष्ठान को देखते हुए यह बदलाव और भी महत्वपूर्ण हो गया है।
परंपरा में बदलाव हमेशा सहज नहीं होता। कई श्रद्धालु मंदिर समिति की ओर “ख़ासे नजर” से देख रहे हैं। उनके मन में सवाल उठ रहे हैं कि क्या सदियों पुरानी रीत को यूं ही बदला जा सकता है? क्या जीवित बकरे का अर्पण सिर्फ प्रतीक था या आस्था का गहरा हिस्सा? हिमालयी लोक-संस्कृति में पशु-अर्पण कई जगहों पर अभी भी जीवित है। जब कोई प्रतीक टूटता है, तो आस्था का ताना-बाना भी थोड़ा ढीला पड़ता है। लोग पूछते हैं कि क्या यह बदलाव देवता की वास्तविक आज्ञा है या आधुनिक संवेदनशीलता और व्यवस्था का दबाव?
दूसरी ओर, यह बदलाव आस्था के विकास का भी संकेत है। 2010 में पशुबलि बंद हुई। अब घांडुवा की परंपरा भी समाप्त। जटा नारियल जैसे प्रतीकात्मक अर्पण की ओर बढ़ना अहिंसा और समय के अनुकूल ढलने का प्रयास लगता है। मंदिर समिति का कहना है कि श्रद्धालु अपनी आस्था जता सकते हैं, सिर्फ माध्यम बदल रहा है। राशि जमा करने की व्यवस्था भी पारदर्शिता की दिशा में कदम है।
जब मंदिर की परंपराएं बदलती हैं, तो समाज पर दोहरी छाप पड़ती है। एक तरफ पुरानी पीढ़ी को अपनी जड़ों से कटने का डर सताता है। दूसरी तरफ नई पीढ़ी और बाहर से आने वाले श्रद्धालु इसे सकारात्मक बदलाव मान सकते हैं। आस्था कभी स्थिर नहीं रहती। वह समय, समाज और परिस्थितियों के साथ बहती रहती है। महासू महाराज स्वयं न्याय के देवता हैं। शायद उनका यह फैसला भी एक तरह का न्याय है। पुरानी रीत और नई संवेदना के बीच संतुलन का।
हनोल का यह निर्णय सिर्फ एक मंदिर का नहीं, बल्कि पूरे जौनसार-बावर और आसपास के क्षेत्रों की सांस्कृतिक चेतना का सवाल है। परंपराएं जीवित रहती हैं तभी जब वे समाज की बदलती जरूरतों से संवाद करती रहें। लेकिन संवाद में आस्था का सम्मान भी उतना ही जरूरी है। घांडुवा अब नहीं चढ़ेगा, पर महासू महाराज की उपस्थिति और न्याय की आस्था वैसे ही बनी रहेगी।
आपकी क्या राय है? क्या परंपराओं में इस तरह के बदलाव जरूरी हैं, या उन्हें यथावत रखना चाहिए? कमेंट्स में अपने विचार जरूर साझा करें।
जय महासू महाराज!
