किशाऊ बांध के विरोध में क्वानू में ग्रामीणों का सांकेतिक धरना।

ब्यूरों रिपोर्ट
बोले ग्रामीण…विकास का विरोध नहीं, लेकिन जमीन और पुश्तैनी गांव की कीमत पर नहीं।
मांग…बांध 6-7 किलोमीटर आगे बनाया जाए या ऊंचाई कम की जाए, ताकि क्वानू की जमीन और गांव बच सके।
विकासनगर/देहरादून। किशाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना को लेकर प्रभावित क्षेत्र के ग्रामीणों की चिंता अब विरोध-प्रदर्शन में बदलने लगी है। गुरुवार को क्वानू गांव में परियोजना के विरोध में ग्रामीणों ने एक दिवसीय सांकेतिक धरना दिया। धरने में पुरुषों के साथ बड़ी संख्या में महिलाओं ने भी भाग लिया। ग्रामीणों ने सरकार से परियोजना को लेकर प्रभावित परिवारों की आपत्तियां सुनने, उन्हें निर्णय प्रक्रिया में शामिल करने तथा जमीन, पुनर्वास, मुआवजा और रोजगार से जुड़े प्रावधानों को स्पष्ट करने की मांग की।
ग्रामीणों ने कहा कि वे विकास या बिजली परियोजना के विरोधी नहीं हैं, लेकिन विकास की कीमत उनके घर, खेत-खलिहान, संस्कृति और पुश्तैनी गांव को डुबोकर नहीं चुकाई जानी चाहिए।
ग्रामीणों ने दिया विकल्प…बांध आगे बनाओ या ऊंचाई कम करो।
क्वानू के ग्रामीणों ने परियोजना को लेकर अपनी मांग भी स्पष्ट कर दी है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि तकनीकी रूप से संभव हो तो बांध का निर्माण मौजूदा प्रस्तावित स्थान से करीब 6 से 7 किलोमीटर आगे किया जाए, ताकि क्वानू गांव की जमीन और आबादी को डूब क्षेत्र से बचाया जा सके।
ग्रामीणों ने दूसरा विकल्प बांध की ऊंचाई कम करने का दिया है। उनका कहना है कि यदि बांध की ऊंचाई कम करने से क्वानू की जमीन, घर और गांव की संस्कृति को डूबने से बचाया जा सकता है तो सरकार को इस विकल्प पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए।
ग्रामीणों का कहना है कि परियोजना से देश और कई राज्यों को लाभ मिलने की बात कही जा रही है, लेकिन यदि इसकी सबसे बड़ी कीमत स्थानीय लोगों को अपनी जमीन और पुश्तैनी गांव छोड़कर चुकानी पड़ेगी, तो परियोजना की योजना बनाते समय प्रभावित लोगों के हितों को भी समान महत्व मिलना चाहिए।
समिति अध्यक्ष बोले पहले बताओ, हमारे लिए क्या है?….
समिति अध्यक्ष सूर्य प्रताप सिंह उर्फ राजा ने कहा कि प्रभावित ग्रामीणों को किशाऊ परियोजना से संबंधित सभी शर्तों और प्रावधानों की पूरी जानकारी दी जानी चाहिए। ग्रामीणों को यह बताया जाना चाहिए कि परियोजना से उनकी कितनी जमीन प्रभावित होगी, कितने परिवार विस्थापित होंगे और उनके पुनर्वास की क्या व्यवस्था की जाएगी।
ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें यह जानने का अधिकार है कि विस्थापन की स्थिति में पुनर्वास कहां होगा, जमीन का मुआवजा किस आधार पर तय किया जाएगा और प्रभावित परिवारों के युवाओं के रोजगार के लिए क्या प्रावधान होंगे।
15 सितंबर को छह राज्यों के बीच हुआ समझौता…..!
किशाऊ परियोजना को लेकर 15 सितंबर 2026 को केंद्र की मौजूदगी में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के बीच समझौता हुआ। केंद्र सरकार ने परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना के रूप में आगे बढ़ाया है।
सरकारी जानकारी के मुताबिक किशाऊ परियोजना टोंस नदी पर उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा क्षेत्र में प्रस्तावित है। परियोजना में करीब 232.6 मीटर ऊंचे कंक्रीट ग्रेविटी बांध के निर्माण का प्रस्ताव है। इसके तहत लगभग 1,562 मिलियन क्यूबिक मीटर जल भंडारण, करीब 97 हजार हेक्टेयर भूमि की सिंचाई और 1,476 मिलियन यूनिट जलविद्युत उत्पादन का लक्ष्य बताया गया है।
सरकार इस परियोजना को जल सुरक्षा, सिंचाई, पेयजल, ऊर्जा और यमुना बेसिन से जुड़े व्यापक लाभों से जोड़कर देख रही है। लेकिन परियोजना क्षेत्र के ग्रामीणों के सामने अपनी जमीन, आजीविका, घर और भविष्य को लेकर सवाल खड़े हैं।
जमीन सिर्फ मुआवजे की रकम नहीं……!
क्वानू के ग्रामीणों का कहना है कि पुश्तैनी जमीन उनके लिए केवल जमीन का एक टुकड़ा नहीं है। इसी जमीन से खेती, पशुपालन, रोजगार और सामाजिक जीवन जुड़ा है। पीढ़ियों से बसे गांव को छोड़कर किसी दूसरी जगह बसना केवल आर्थिक मुआवजे का मामला नहीं है।
ग्रामीणों का कहना है कि अगर परियोजना के कारण परिवारों को विस्थापित होना पड़ता है तो सरकार को पहले यह स्पष्ट करना चाहिए कि प्रभावित परिवारों का पुनर्वास कहां और किस तरीके से होगा। कृषि और आवासीय भूमि का मूल्यांकन किस आधार पर होगा, आजीविका का विकल्प क्या होगा और स्थानीय युवाओं को रोजगार में क्या प्राथमिकता मिलेगी इन सभी सवालों का स्पष्ट जवाब जरूरी है।
ग्रामीण महिलाओं ने भी कहा कि जमीन और गांव से उनका भावनात्मक और आर्थिक जुड़ाव है। इसलिए परियोजना से जुड़े फैसले केवल सरकारी कार्यालयों में नहीं, बल्कि प्रभावित गांवों के लोगों के साथ बातचीत के बाद होने चाहिए।
वर्षों पुरानी परियोजना, अब फिर तेज हुई हलचल….!
किशाऊ परियोजना नई नहीं है। उत्तराखंड सरकार के अनुसार इसकी परिकल्पना वर्ष 1940 में की गई थी। करीब आठ दशक से लंबित इस परियोजना को सितंबर 2026 में छह राज्यों के बीच हुए समझौते के बाद नई गति मिली है।
परियोजना को लेकर उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के बीच वर्ष 2015 में भी समझौता हुआ था और संयुक्त उपक्रम के लिए किशाऊ कॉरपोरेशन लिमिटेड का गठन किया गया था। सरकारी दस्तावेजों में परियोजना को टोंस नदी पर प्रस्तावित बहुउद्देशीय परियोजना के रूप में दर्ज किया गया है।
अब परियोजना के आगे बढ़ने के साथ प्रभावित क्षेत्र में जमीन, विस्थापन और पुनर्वास का सवाल फिर से प्रमुख हो गया है।
ग्रामीणों ने सरकार के सामने रखे सवाल…..!
क्वानू में धरना दे रहे ग्रामीणों ने सरकार से मांग की कि परियोजना को आगे बढ़ाने से पहले प्रभावित परिवारों के साथ खुली बैठक की जाए। परियोजना की वर्तमान स्थिति, प्रभावित गांवों की सूची, डूब क्षेत्र, प्रभावित होने वाली भूमि, मुआवजा, पुनर्वास, रोजगार और अन्य अधिकारों से संबंधित जानकारी सार्वजनिक की जाए।
ग्रामीणों की मुख्य मांग है कि क्वानू गांव को बचाने के लिए परियोजना के डिजाइन और स्थान पर पुनर्विचार किया जाए। इसके लिए या तो बांध को करीब 6 से 7 किलोमीटर आगे ले जाने की संभावनाओं का तकनीकी अध्ययन कराया जाए या फिर बांध की ऊंचाई कम करने के विकल्प पर विचार किया जाए।
ग्रामीणों ने स्पष्ट किया कि उनका विरोध विकास के खिलाफ नहीं है। उनका सवाल है कि अगर परियोजना से कई राज्यों और बड़ी आबादी को लाभ मिलेगा, तो उस विकास की कीमत चुकाने वाले स्थानीय परिवारों की जमीन, आजीविका, संस्कृति और भविष्य की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी सरकार को सुनिश्चित करनी होगी।
क्वानू में हुआ यह सांकेतिक धरना फिलहाल एक दिन का विरोध है, लेकिन ग्रामीणों की मांग ने किशाऊ परियोजना के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा कर दिया है। क्या परियोजना को आगे बढ़ाते समय ऐसा विकल्प तलाशा जा सकता है, जिससे विकास भी हो और क्वानू का गांव, जमीन और संस्कृति भी बची रहे?
अब निगाह सरकार के अगले कदम पर है।



