उत्तराखंड

TSP के ₹2,019 करोड़ का सवाल: जौनसार-बावर के गांवों तक पैसा पहुंचा या चुनिंदा जेबों में?….

ब्यूरों रिपोर्ट

उत्तराखंड में अनुसूचित जनजातियों के विकास के नाम पर पिछले तीन सालों (2022-23 से 2024-25) में Tribal Sub Plan यानी TSP के तहत ₹2,019.88 करोड़ का आवंटन दर्ज है। केंद्र के आंकड़े साफ हैं। राज्य में 509 ST-dominated गांव चिन्हित हैं। सरकार खुद कहती है कि यह राशि अलग Grant Head में रखी जाती है, दूसरे कामों में डायवर्ट नहीं की जा सकती। पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य, विद्युतीकरण, सड़क और ग्रामीण आवास ये प्राथमिकताएं बताई गई हैं।

लेकिन सबसे बड़ा और कड़वा सवाल यही है।इसमें से जनजातीय बहुल जौनसार-बावर और चकराता विधानसभा क्षेत्र को कितना मिला? जमीन पर कितना खर्च हुआ? पिछले पांच सालों का “बजट बनाम स्वीकृति बनाम जारी बनाम वास्तविक खर्च बनाम जमीन पर काम” का एकीकृत, पारदर्शी हिसाब सार्वजनिक पोर्टल पर कहीं साफ-साफ उपलब्ध नहीं है।

चकराता में कुछ काम हुए जरूर। लोक निर्माण विभाग के रिकॉर्ड में कालसी विकासखंड के कुसियों-कचटा-खाती मोटर मार्ग का पुनर्निर्माण/सुधारीकरण TSP के तहत दर्ज है। सड़कें बनीं, कुछ विकास कार्य दिखे। लेकिन पूरा क्षेत्र विकास का प्रतीक नहीं बन पाया। क्यों?

विकास क्यों नहीं दिख रहा?…..

₹2,000 करोड़ से ज्यादा की राशि अगर सही मायने में जनजातीय गांवों तक पहुंचती, तो चकराता-त्यूणी-कालसी के इलाके में स्कूली शिक्षा, कौशल विकास केंद्र, स्वास्थ्य सुविधाएं, रोजगार के अवसर और बुनियादी ढांचे का चेहरा बदल जाना चाहिए था। लेकिन जमीन पर हकीकत कुछ और ही है। गांवों में अभी भी बुनियादी सुविधाओं की कमी है, युवा रोजगार के लिए बाहर भाग रहे हैं, और विकास के नाम पर छोटी-छोटी योजनाएं चल रही हैं।

सवाल स्वाभाविक है, क्या यह पैसा चुनिंदा लोगों की जेब में जा रहा है? जो जनहित को प्राथमिकता देने के बजाय अपने व्यक्तिगत हित साध रहे हैं? खड्डजा, पुलिया, छोटी-छोटी सड़कें या मरम्मत के काम स्वीकृत कराकर लिपापोती कर अपनी जेबें भर रहे हैं? अगर बड़े, दीर्घकालिक और जन-केंद्रित प्रोजेक्ट जैसे अच्छे स्कूल, कॉलेज, कौशल केंद्र, अस्पताल या रोजगार पैदा करने वाले उद्योग नहीं बन रहे, तो पैसा कहां जा रहा है?

अगर पैसा सही इस्तेमाल होता तो…।

₹2,019 करोड़ की रकम का अंदाजा लगाने के लिए तुलना करें तो एक नए IIT के स्थायी परिसर का खर्च (मूल अनुमान और बाद में बढ़ी हुई लागत को मिलाकर) अक्सर ₹1,500–2,000 करोड़ या उससे अधिक का होता है। एक नए AIIMS का निर्माण भी आमतौर पर ₹1,000–1,800 करोड़ के आसपास पड़ता है।

इस हिसाब से अगर यह राशि सही और पारदर्शी तरीके से खर्च होती, तो चकराता जैसे जनजातीय बाहुल्य क्षेत्र में कम-से-कम एक बड़े स्तर का उच्च शिक्षा संस्थान (IIT स्तर का) और एक बड़ा चिकित्सा संस्थान (AIIMS स्तर का) आसानी से खड़ा किया जा सकता था। या फिर दर्जनों अच्छे स्कूल, कॉलेज, कौशल विकास केंद्र, स्वास्थ्य केंद्र और रोजगार पैदा करने वाले प्रोजेक्ट। लेकिन आज चकराता में न तो ऐसा कोई बड़ा संस्थान दिखता है, न ही विकास की वह रफ्तार जो इतनी बड़ी राशि से अपेक्षित थी।

जनजातीय सलाहकार परिषद कहां है?….

सरकार के पास जनजातीय सलाहकार परिषद (Tribal Advisory Council) है। इसका काम ही यही है कि वह सरकार को सलाह दे। जनजातीय विकास के लिए कितने स्कूल, कॉलेज, कौशल विकास केंद्र, रोजगार और व्यवसाय खुलने चाहिए। छोटी-छोटी पुलिया और खड्डजा नहीं, बल्कि बड़े और स्थायी बदलाव वाले काम।

तो सवाल सीधा है कि इस परिषद ने पिछले वर्षों में TSP बजट खर्च करने के लिए सरकार को क्या सलाह-मशविरा दिया? वह सलाह सार्वजनिक क्यों नहीं है? अगर परिषद ने बड़े संस्थानों, शिक्षा और रोजगार पर जोर दिया था, तो उसे लागू क्यों नहीं किया गया? और अगर नहीं दिया, तो परिषद का अस्तित्व ही क्या?

अब पारदर्शिता की जरूरत……।

सरकार को तुरंत चकराता विधानसभा क्षेत्र के लिए पिछले पांच वर्षों का पूरा हिसाब सार्वजनिक करना चाहिए। वर्षवार आवंटन, स्वीकृति, जारी राशि, वास्तविक खर्च और जमीन पर हुए कामों की सूची। क्योंकि सवाल सिर्फ करोड़ों रुपये के बजट का नहीं है।

सवाल यह है कि जनजातियों के नाम पर निर्धारित पैसा आखिर जनजातीय गांव तक कितना पहुंचा? और अगर नहीं पहुंचा, तो किसकी जेब में गया?

जनजातीय समुदाय इंतजार कर रहा है। अब सिर्फ आंकड़े नहीं, जवाब चाहिए।

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