“जनता के मुद्दे बनाम निजी सवाल: क्या चकराता की आवाज़ भटक गई है?”
ब्यूरों रिपोर्ट, देहरादून
उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी भराड़ीसैंण विधानसभा परिसर में चल रहे बजट सत्र के दौरान चकराता के विधायक प्रीतम सिंह ने सदन में एक महिला को लेकर सवाल उठाया। लोकतंत्र में सवाल पूछना जनप्रतिनिधि का अधिकार है, लेकिन इस घटना ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि,
क्या यह वास्तव में चकराता की जनता का सबसे बड़ा मुद्दा था?
क्योंकि हकीकत यह है कि चकराता आज कई गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है, जिनकी आवाज़ सदन में उतनी ताकत से सुनाई नहीं दी जितनी उम्मीद की जा रही थी।
चकराता के असली जख्म……
1. तिहरा हत्याकांड..
हाल ही में चकराता क्षेत्र के भूड़ गांव में हुई 3 लोगों की हत्या ने पूरे इलाके को दहला दिया। यह मामला केवल एक अपराध नहीं बल्कि क्षेत्र में कानून व्यवस्था की स्थिति पर सवाल खड़ा करता है।
2. जजरेट में दर्दनाक हादसा…
जजरेट क्षेत्र में पहाड़ी से पत्थर गिरने के कारण एक युवक की मौत हो गई। यह घटना बताती है कि पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क और भूस्खलन सुरक्षा के लिए अभी भी पर्याप्त व्यवस्था नहीं है।
3. 700 बीघा जमीन का विवाद…
वन गुर्जरों के नाम पर लगभग 700 बीघा जमीन को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है। यह मामला सामाजिक और प्रशासनिक दोनों दृष्टि से बेहद संवेदनशील है।
4. शिक्षा और स्वास्थ्य की दुर्दशा…
चकराता जैसे दूरस्थ इलाके में कई स्कूलों में शिक्षकों की कमी है या आते ही नहीं है तथा अस्पतालों में डॉक्टरों का अभाव। ग्रामीणों को छोटी-छोटी बीमारियों के लिए भी कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता है।
इन सबके बावजूद यदि सदन में चर्चा का केंद्र कोई और मुद्दा बन जाए, तो स्वाभाविक है कि जनता सवाल पूछेगी ही?
विधानसभा: जनता की आवाज़ या राजनीति का मंच?…
विधानसभा का मंच इसलिए बनाया गया है ताकि दूर-दराज़ के इलाकों की समस्याएँ सरकार तक पहुँच सकें।
जब चकराता जैसे संवेदनशील क्षेत्र का प्रतिनिधि सदन में बोलता है तो वह केवल एक नेता नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की उम्मीदों का प्रतिनिधि होता है।
ऐसे में जनता यह उम्मीद करती है कि उनका प्रतिनिधि उनकी पीड़ा, उनकी समस्याएँ और उनके अधिकार सबसे पहले उठाए।
इतिहास की चेतावनी….
भारतीय इतिहास और महाकाव्यों में बार-बार यह संदेश मिलता है कि महिलाओं से टकराव या उनके सम्मान से जुड़े मामलों को हल्के में लेने का परिणाम हमेशा विनाशकारी रहा है।
रावण ने माता सीता का हरण किया और उसका समूचा साम्राज्य खत्म हो गया।
दुर्योधन ने सभा में द्रौपदी का अपमान किया और अंततः महाभारत के युद्ध में उसका पतन हुआ।
इतिहास की ये घटनाएँ बताती हैं कि महिलाओं से जुड़े मुद्दों को राजनीति का हथियार नहीं बल्कि संवेदनशीलता के साथ देखने की जरूरत होती है।
चकराता पूछ रहा है…..!
आज चकराता की जनता के मन में एक ही सवाल है कि
क्या तिहरा हत्याकांड पर सरकार से जवाब मांगा जाएगा?
क्या जजरेट जैसी घटनाओं से बचाव के लिए कोई योजना बनेगी?
क्या 700 बीघा जमीन विवाद का समाधान होगा?
क्या शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था सुधरेगी?
यदि ये सवाल सदन में मजबूती से उठेंगे, तभी लोकतंत्र का अर्थ पूरा होगा।
विधानसभा का मंच किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं, बल्कि जनता की समस्याओं के समाधान के लिए होता है।
चकराता की जनता अपने प्रतिनिधि से यही उम्मीद करती है कि वे राजनीतिक विवादों से ऊपर उठकर क्षेत्र के असली मुद्दों को सदन में सबसे ज्यादा जोरदार तरीके से रखें।
क्योंकि अंततः इतिहास वही याद रखता है,
जो जनता के लिए खड़ा हुआ, न कि जो मुद्दों से भटक गया।



