क्या वास्तव में हम पहले से ही हिंदू राष्ट्र हैं?…..

ब्यूरों रिपोर्ट,
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने हाल ही में एक बयान दिया। “भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की कोई आवश्यकता नहीं है। यह पहले से ही हिंदू राष्ट्र है। ऋषियों और मुनियों ने इसे राष्ट्र घोषित कर दिया था। यह किसी अधिकृत घोषणा का मोहताज नहीं है। इसे मान लेने में ही सबका भला है।”
यह वक्तव्य अपने आप में गहरा संदेश रखता है। एक ओर यह भारतीय संस्कृति की जड़ों से जुड़ने की बात करता है, तो दूसरी ओर यह सवाल भी खड़ा करता है कि क्या संविधान और राजनीति की परिभाषाओं से इतर किसी सांस्कृतिक सच्चाई को मान लेने से ही समस्या हल हो जाएगी?
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद बनाम संवैधानिक राष्ट्रवाद…..।
संघ का तर्क यह है कि भारत की अस्मिता केवल संविधान की उपज नहीं है। हजारों वर्षों पुरानी सभ्यता, विविध आस्थाओं और परंपराओं से निर्मित भारत एक सांस्कृतिक राष्ट्र है और इसी को वह “हिंदू राष्ट्र” कहता है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और संवैधानिक राष्ट्रवाद एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं?
संविधान कहता है कि भारत धर्मनिरपेक्ष है।
संघ कहता है कि भारत सांस्कृतिक रूप से हिंदू राष्ट्र है।
दोनों दृष्टिकोण समानांतर चल सकते हैं, बशर्ते कि “हिंदू” शब्द को धर्म नहीं बल्कि संस्कृति और जीवन शैली के रूप में समझा जाए।
आलोचनाओं की अनदेखी नहीं…..।
भागवत के बयान के बाद आलोचना भी स्वाभाविक है।
अल्पसंख्यक समुदायों को यह डर सताता है कि “हिंदू राष्ट्र” की परिभाषा कहीं उन्हें हाशिए पर न धकेल दे।
राजनीतिक दल इसे चुनावी ध्रुवीकरण का औजार बताते हैं।
बौद्धिक वर्ग इसे संविधान की भावना के विपरीत मानता है।
यानी यह विमर्श केवल विचारधारा का नहीं, बल्कि विश्वास और भरोसे का भी है।
स्वीकार्यता का सवाल…..।
भागवत ने कहा कि इसे मानने में सबका लाभ है, और न मानने में नुकसान।
लाभ क्या हो सकता है?
भारतीय पहचान पर गर्व।
सभ्यता की जड़ों से जुड़ाव।
विश्व के सामने एक सांस्कृतिक शक्ति के रूप में उभरना।
नुकसान क्या हो सकता है?
यदि “हिंदू राष्ट्र” की परिभाषा संकुचित हुई तो यह समाज में अविश्वास और विभाजन को जन्म देगी।
मोहन भागवत का कथन कोई साधारण राजनीतिक वक्तव्य नहीं है, यह एक दार्शनिक दृष्टिकोण है। परंतु यह भी सच है कि भारत की ताकत उसकी बहुलता है।
भारत को यदि वास्तव में “हिंदू राष्ट्र” मानना है, तो उसकी परिभाषा इतनी व्यापक होनी चाहिए कि उसमें हर धर्म, हर समुदाय और हर संस्कृति के लोग सहजता से शामिल हो सकें।
यही वह संतुलन है जो भारत की आत्मा को अक्षुण्ण रख सकता है।
क्योंकि भारत केवल बहुसंख्यक की पहचान पर नहीं, बल्कि सभी की साझी विरासत पर टिका है।