उत्तराखंड

यमुना तट पर फिर लौट रहा हरिपुर का वैभव, 2100 दीपों की रोशनी में जागी सदियों पुरानी विरासत।

हरिपुर, कालसी।

जहां यमुना की लहरों में इतिहास की गूंज है। जहां अशोक का शिलालेख हजारों साल पुरानी कहानी कहता है, जहां बाड़वाला-जगतग्राम की धरती पर अश्वमेध यज्ञ की वेदिकाएं आज भी प्राचीन वैदिक परंपरा की गवाही देती हैं, और जहां पौराणिक मान्यताओं में महर्षि वेदव्यास की तपोस्थली होने की बात कही जाती है। वही हरिपुर अब एक बार फिर अपनी खोई हुई पहचान की ओर लौटता दिखाई दे रहा है।

17 सितंबर को हरिपुर-कालसी का यमुना तट केवल एक सरकारी लोकार्पण का साक्षी नहीं बना, बल्कि आस्था, इतिहास और आधुनिक विकास के एक नए अध्याय की शुरुआत का गवाह बना। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मां यमुना की 21 फीट ऊंची प्रतिमा का अनावरण किया और नवनिर्मित हरिघाट का लोकार्पण किया। इसी अवसर पर मां यमुना-कृष्ण मंदिर का शिलान्यास भी हुआ। कार्यक्रम में क्षेत्रीय विधायक मुन्ना सिंह चौहान सहित साधु-संत, जनप्रतिनिधि और बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।

यमुना तट पर आयोजित ‘आशीर्वाद का दीया’ कार्यक्रम में 2100 दीपों की रोशनी ने पूरे घाट को आध्यात्मिक आभा से भर दिया। मुख्यमंत्री ने साधु-संतों और श्रद्धालुओं के साथ यमुना आरती में भाग लिया। करीब 7.52 करोड़ रुपये की लागत से विकसित हरिघाट को श्रद्धालुओं की सुविधा, सुरक्षा और तट के सौंदर्यीकरण की दृष्टि से तैयार किया गया है।

हरिपुर सिर्फ घाट नहीं, इतिहास का एक जीवंत अध्याय….!

हरिपुर की पहचान केवल आज बने नए घाट से नहीं है। इसकी जड़ें कहीं अधिक गहरी हैं।

पौराणिक मान्यताओं में हरिपुर क्षेत्र को महर्षि वेदव्यास की तपोस्थली से जोड़ा जाता है। स्थानीय धार्मिक परंपराओं में यह भूमि सदियों से यज्ञ, तप, पिंडदान और धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़ी मानी जाती रही है। ऐतिहासिक स्रोतों में भी कालसी-हरिपुर क्षेत्र का महत्व सामने आता है।

कालसी में स्थित सम्राट अशोक का शिलालेख इस क्षेत्र की प्राचीनता और ऐतिहासिक महत्व का महत्वपूर्ण प्रमाण है। वहीं कुछ दूरी पर स्थित बाड़वाला-जगतग्राम का अश्वमेध यज्ञ स्थल इस पूरे क्षेत्र को वैदिक परंपरा से जोड़ता है। पुरातात्विक उत्खनन में यहां प्राचीन यज्ञ वेदिकाओं के अवशेष मिले हैं और इसे राष्ट्रीय महत्व के स्मारक के रूप में संरक्षित किया गया है।

यानी हरिपुर और उसके आसपास की धरती पर पौराणिक स्मृतियां, बौद्धकालीन इतिहास और प्राचीन वैदिक परंपरा तीनों की परतें एक साथ दिखाई देती हैं।

सिरमौर की राजधानी से फिर आध्यात्मिक पहचान की ओर….!

हरिपुर-कालसी का संबंध सिरमौर रियासत के इतिहास से भी रहा है। हिमाचल प्रदेश सरकार के इतिहास संबंधी दस्तावेज में भी सिरमौर की राजधानी के विभिन्न कालखंडों में कालसी से जुड़े होने का उल्लेख मिलता है।

समय बदला, राजधानियां बदलीं, राजनीतिक और प्रशासनिक केंद्र बदले। आधुनिक विकास की दौड़ में हरिपुर की ऐतिहासिक पहचान कहीं पीछे छूटती चली गई।

लेकिन अब तस्वीर बदलती नजर आ रही है…..!

यमुना के तट पर बन रहा घाट, मां यमुना की भव्य प्रतिमा, प्रस्तावित यमुना-कृष्ण मंदिर और धार्मिक पर्यटन से जुड़ी योजनाएं इस क्षेत्र को फिर से उसकी सांस्कृतिक पहचान से जोड़ने की कोशिश हैं।

‘हरिद्वार’ की नकल नहीं, यमुना का अपना तीर्थ…..!

हरिपुर को यमुना के मैदानी क्षेत्र में प्रवेश के महत्वपूर्ण स्थल के रूप में विकसित करने की परिकल्पना सामने आई है। सरकार और स्थानीय स्तर पर इसे धार्मिक पर्यटन के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में काम हो रहा है।

यहां बात किसी दूसरे तीर्थ की नकल करने की नहीं, बल्कि यमुना के अपने धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास को पहचान देने की है।

यमुना यहां केवल एक नदी नहीं है। यह जौनसार-बावर की लोकआस्था, देवी-देवताओं की परंपरा, ऋषि-मुनियों की कथाओं और हिमालय से मैदान तक पहुंचती भारतीय संस्कृति की एक जीवंत धारा है।

सनातन की जड़ों से आधुनिक विकास तक…..!

आज जब भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक स्तर पर सामने रखने की चर्चा हो रही है, तब हरिपुर जैसे स्थलों का पुनर्जीवन केवल पर्यटन का विषय नहीं रह जाता।

‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश देने वाली भारतीय परंपरा की शक्ति उसकी हजारों साल पुरानी सांस्कृतिक स्मृतियों में भी दिखाई देती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में देश के अनेक धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों के विकास तथा उन्हें बेहतर सुविधाओं से जोड़ने पर जोर दिया गया है। हरिपुर का विकास भी इसी व्यापक सांस्कृतिक-पर्यटन दृष्टि के संदर्भ में देखा जा सकता है। मुख्यमंत्री धामी ने भी कार्यक्रम में उत्तराखंड के पौराणिक एवं ऐतिहासिक स्थलों को आधुनिक पर्यटन सुविधाओं से जोड़ने और स्थानीय रोजगार के अवसर बढ़ाने की बात कही।

हरिपुर का नया अध्याय…..!

मुख्यमंत्री द्वारा हरिघाट का लोकार्पण और मां यमुना की प्रतिमा का अनावरण केवल एक दिन का आयोजन नहीं है। यह उस विरासत को फिर से सामने लाने का प्रयास है, जो लंबे समय से इतिहास की किताबों और स्थानीय स्मृतियों में सिमटी हुई थी।

अब चुनौती यह है कि घाट बने तो उसके साथ इतिहास भी दिखे, मंदिर बने तो संस्कृति भी बचे, पर्यटक आएं तो स्थानीय लोगों की आजीविका भी मजबूत हो और विकास हो तो यमुना की निर्मलता भी कायम रहे।

हरिपुर के पास इतिहास है, आस्था है, प्रकृति है और यमुना है…..!

जरूरत सिर्फ इस बात की है कि इन सभी को एक सूत्र में पिरोकर हरिपुर को उसकी वास्तविक पहचान दी जाए।

कल तक जो हरिपुर इतिहास के पन्नों में दिखाई देता था, आज वही हरिपुर यमुना के तट पर नए स्वरूप में सामने खड़ा है।

2100 दीपों की रोशनी में शायद संदेश यही था कि,
हरिपुर की विरासत खत्म नहीं हुई थी… वह बस अपने पुनर्जागरण की प्रतीक्षा कर रही थी।

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