राष्ट्रीय

“मनरेगा पर ब्रेक, ‘जी राम जी’ पर सवाल? मजदूरों की जेब खाली, सरकार के दावे भारी”

ब्यूरों रिपोर्ट

वित्तीय वर्ष 2026-27 की शुरुआत के साथ ही केंद्र की नई योजना “जी राम जी” सुर्खियों में है। लेकिन जमीनी हकीकत एक बिल्कुल अलग कहानी बयान कर रही है।ऐसी कहानी जो सीधे तौर पर नरेंद्र मोदी सरकार के दावों पर सवाल खड़े करती है।

 

देश की सबसे बड़ी रोजगार योजना मनरेगा, जिसने करोड़ों ग्रामीण परिवारों को सहारा दिया, आज खुद संकट में नजर आ रही है। उत्तराखंड के चकराता, कालसी सहीत पूरे उत्तराखंड से जो आवाज उठ रही है, वो बेहद चिंताजनक है। मजदूरों को पिछले तीन महीनों से भुगतान नहीं मिला है।

कानून बनाम हकीकत: जवाब कौन देगा?…

मनरेगा एक्ट साफ कहता है कि मजदूरों को 15 दिनों के भीतर मजदूरी का भुगतान किया जाना चाहिए।
तो सवाल सीधा है कि,

जब कानून मौजूद है, तो 90 दिन बाद भी मजदूरी क्यों नहीं मिली?

सरकार ने नया वित्तीय वर्ष शुरू होने से पहले पुराना हिसाब क्यों नहीं चुकाया?

यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि गरीबों के हक पर सीधा प्रहार है।

“जी राम जी” की एंट्री क्या मनरेगा को साइडलाइन किया जा रहा है?..

1 अप्रैल से “जी राम जी” योजना लागू हो रही है। सरकार इसे रोजगार का नया मॉडल बता रही है, लेकिन जिस तरह मनरेगा को कमजोर किया गया, उससे एक बड़ा संदेह खड़ा होता है।

क्या सरकार इस योजना को धीरे-धीरे खत्म करना चाहती है?
जब पुरानी योजना के भुगतान ही नहीं हो रहे, तो नई योजना पर भरोसा कैसे किया जाए?

तकनीक या नया झंझट?….

सरकार अब मजदूरी भुगतान को रेटिना स्कैन (आंखों की पहचान) से जोड़ने की बात कर रही है।

लेकिन हकीकत देखिए,

उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में नेटवर्क तक ठीक से नहीं आता।

कई गांवों में बिजली और इंटरनेट की स्थिति कमजोर है।

ऐसे में सवाल उठता है कि,

जहां मोबाइल नेटवर्क तक नहीं चलता, वहां रेटिना सिस्टम कैसे चलेगा?

क्या यह योजना मजदूरों की सुविधा के लिए है या उन्हें सिस्टम में उलझाने के लिए?

 

कर्मचारी भी बेहाल…..

यह सिर्फ मजदूरों की कहानी नहीं है।

कई कर्मचारियों को 6 महीने से वेतन नहीं मिला है।

यह सीधे-सीधे बताता है कि सिस्टम अंदर से कितना चरमराया हुआ है।

जमीनी गुस्सा, जो सत्ता तक पहुंचेगा…..।

गांवों से उठ रही आवाज बेहद साफ है कि,

“हमें रोजगार चाहिए, वादे नहीं…
हमें समय पर पैसा चाहिए, भाषण नहीं…”

आज मजदूर अपनी मेहनत की कमाई के लिए दर-दर भटक रहा है, और सरकार बड़े-बड़े दावे कर रही है। यह विरोधाभास अब छिपने वाला नहीं है।

बड़ा सवाल—जवाब कब?…..

क्या मोदी सरकार मजदूरों के अधिकारों के प्रति गंभीर है?

क्या मनरेगा को जानबूझकर कमजोर किया जा रहा है?

और सबसे बड़ा सवाल गरीब का पैसा कब मिलेगा?

अगर सरकार ने जल्द जवाब नहीं दिया, तो यह मुद्दा सिर्फ गांवों तक सीमित नहीं रहेगा।

यह राजनीतिक तूफान बन सकता है।

यह सिर्फ एक योजना की बात नहीं है,
यह उस भरोसे की बात है जो आज टूट रहा है।

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