उत्तराखंड

डाकपत्थर में जमीन पर सियासी घमासान: “पैनिक नहीं तो आदेश रद्द कराओ” नवप्रभात का सीधा सवाल।

ब्यूरो रिपोर्ट, देहरादून

डाकपत्थर की जमीन को लेकर सियासत अब खुलकर सामने आ गई है। पूर्व कैबिनेट मंत्री नवप्रभात ने बड़ा दावा करते हुए कहा है कि यूआईआईडीबी द्वारा चयनित निजी कंपनी के नाम पर जिलाधिकारी कार्यालय से दाखिला-खारिज की प्रक्रिया हो चुकी है। इस दावे ने स्थानीय लोगों के बीच बेचैनी बढ़ा दी है।

इसी बीच, क्षेत्रीय विधायक द्वारा लोगों से “पैनिकहोने” की अपील पर नवप्रभात ने तीखा सवाल दागा है कि,

“अगर पैनिक की जरूरत नहीं है, तो उस कंपनी के नाम हुए दाखिला-खारिज का आदेश तुरंत रद्द क्यों नहीं करवाते?”

क्या है पूरा मामला?….

आरोप है कि सरकार ने प्रदेश की 14 जगहों की जमीन चिन्हित कर एक निजी कंपनी को सौंपने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

डाकपत्थर परियोजना की जमीन, जिसमें जल विद्युत निगम, सिंचाई विभाग और ग्राम सभा की भूमि शामिल बताई जा रही है,भी इसी दायरे में आ गई है।

नवप्रभात का कहना है कि यह सिर्फ “डेवलपमेंट” नहीं बल्कि स्थानीय हितों की कीमत पर निजी लाभ का मामला बनता जा रहा है।

घर-व्यवसाय पर खतरा……

पूर्व मंत्री ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि,

“यह सिर्फ जमीन का मामला नहीं है, बल्कि पीढ़ियों से बसे लोगों के घर और कारोबार पर सीधा हमला है।”

उन्होंने विधायक से मांग की है कि

दाखिला-खारिज के सभी आदेश तत्काल रद्द कराए जाएं।

आदेशों को सार्वजनिक किया जाए ताकि “संदेह की स्थिति खत्म हो”

कांग्रेस बनाम भाजपा – विकास या निजीकरण?….

नवप्रभात ने अपने कार्यकाल का जिक्र करते हुए कहा कि,
कांग्रेस सरकार ने भी जमीन अधिग्रहण किया, लेकिन

डिग्री कॉलेज,

कोर्ट,

अस्पताल,

आरटीओ ऑफिस,

जैसे सार्वजनिक हित के लिए

उन्होंने साफ कहा कि,

“अगर जमीन जनता के काम के लिए है तो हम साथ हैं लेकिन अगर किसी प्राइवेट कंपनी के होटल के लिए है
तो इसका हम विरोध करेंगे।”

बड़ा सवाल: किसकी कीमत पर “विकास”?….

नवप्रभात ने सीधा सवाल उठाया है कि,

क्या स्थानीय लोगों के घर और दुकान उजाड़कर किसी कंपनी को जमीन देना उचित है?

क्या डाकपत्थर बैराज के आसपास “आलिशान होटल” बनाने की कीमत स्थानीय रोजगार को भेंट चढ़ाकर होगी?

जनता में बढ़ रही बेचैनी……

इस पूरे विवाद ने कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं।

क्या वास्तव में जमीन का हस्तांतरण हो चुका है?

अगर नहीं, तो आदेश सार्वजनिक क्यों नहीं हो रहे?

और अगर हो चुका है, तो स्थानीय लोगों को भरोसे में क्यों नहीं लिया गया?

डाकपत्थर का यह मुद्दा अब सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रहा, बल्कि जनभावनाओं, पारदर्शिता और राजनीतिक जवाबदेही की कसौटी बन चुका है।

अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि,

विधायक इस चुनौती का जवाब कैसे देते हैं।

और सरकार जनता के सामने सच कब रखती है।

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