उत्तराखंड

राजधानी असुरक्षित, जिम्मेदार कौन?……

देहरादून शहर में पिछले 11 दिनों में 3 हत्याएं और 48 घंटों में 2 हत्याएं ये सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, ये उस कानून व्यवस्था की पोल हैं जिस पर लगातार “सब ठीक है” का पर्दा डाला जा रहा है।

उत्तराखंड की राजधानी, जिसे कभी शांत और सुरक्षित शहर माना जाता था, आज दिनदहाड़े गोलियों की आवाज से दहल रही है। ताज़ा घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या देवभूमि की कानून व्यवस्था पूरी तरह से लचर हो चुकी है?

सत्ता जिनके हाथ, जिन्हें जनता ने ही नकारा…..।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट दोनों ही अपने-अपने चुनाव हार चुके नेता हैं। जनता ने लोकतांत्रिक तरीके से अपना फैसला सुना दिया था।

लेकिन सवाल यह है कि जब जनता ने नकार दिया, तब भी सत्ता की बागडोर इन्हीं हाथों में क्यों सौंपी गई?
क्या लोकतंत्र में जनता का फैसला अंतिम नहीं होना चाहिए?
या फिर उत्तराखंड की राजनीति में केंद्रीय नेतृत्व का निर्णय ही सर्वोपरि है?

कानून व्यवस्था: राजधानी में गोलियां, सत्ता मौन……।

पिछले 11 दिनों में 3 हत्याएं।
सिर्फ 48 घंटों में 2 हत्याएं।

ये घटनाएं बताती हैं कि अपराधियों के हौसले किस कदर बुलंद हैं। राजधानी में खुलेआम गोलियां चल रही हैं, और सरकार की प्रतिक्रिया बयानबाज़ी से आगे नहीं बढ़ पा रही।

देवभूमि की पहचान शांति, संस्कृति और सरल जीवनशैली से रही है। लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि लोग खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे हैं।

केंद्र की जिम्मेदारी भी सवालों में……।

राज्य की सत्ता भाजपा के हाथ में है और केंद्र में भी भाजपा की सरकार, जिसका नेतृत्व नरेंद्र मोदी कर रहे हैं।
जब राज्य और केंद्र दोनों जगह एक ही दल की सरकार हो, तो जवाबदेही भी साझा होनी चाहिए।

अगर राजधानी में लगातार हत्याएं हो रही हैं, तो क्या यह सिर्फ राज्य सरकार की विफलता है?
या फिर यह उस राजनीतिक संरचना की भी नाकामी है जिसने जनता के नकारे हुए चेहरों को फिर से सत्ता की कुर्सी पर बैठाया?

क्या प्राथमिकता जनता है या कुछ और?…..

प्रदेश में लगातार यह आरोप उठते रहे हैं कि संसाधनों पर बाहरी प्रभाव बढ़ रहा है। स्थानीय लोगों में यह भावना पनप रही है कि उनकी सुरक्षा, रोजगार और सम्मान सरकार की प्राथमिकता में नहीं हैं।
जब अपराध बढ़ते हैं और सत्ता खामोश रहती है, तो जनता के मन में यही सवाल उठता है।

क्या देवभूमि की सेवा सच में प्राथमिकता है, या सत्ता सिर्फ राजनीतिक समीकरणों का खेल बनकर रह गई है?

जवाब चाहिए, आश्वासन नहीं…….।

देहरादून की सड़कों पर बहा खून सिर्फ तीन परिवारों का दर्द नहीं है, यह पूरे प्रदेश की सुरक्षा पर सवाल है।

सरकार को बताना होगा:

अपराधियों पर ठोस कार्रवाई कब?

पुलिस व्यवस्था में सुधार कैसे?

राजधानी को सुरक्षित बनाने की ठोस योजना क्या है?

देवभूमि की जनता भावनाओं से नहीं, परिणामों से संतुष्ट होगी।

अगर सत्ता जनता के भरोसे पर टिकी है, तो जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।

अब सवाल सीधा है…..।
क्या उत्तराखंड की कानून व्यवस्था राजनीतिक प्रयोगों की कीमत चुका रही है?
या फिर सत्ता को अब भी लगता है कि सब कुछ “कंट्रोल” में है?

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