उत्तराखंड

हरबर्टपुर: अंधेरे में शहर, सवालों के घेरे में सिस्टम और अब विधायक की परीक्षा….।

ब्यूरों रिपोर्ट

विकासनगर क्षेत्र के हरबर्टपुर में हालात सिर्फ “बिजली के बकाया” तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह मामला अब शासन, व्यवस्था और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही की सीधी परीक्षा बन चुका है। नगर पालिका अध्यक्ष नीरू देवी द्वारा क्षेत्रीय विधायक मुन्ना सिंह चौहान को सौंपे गए ज्ञापन ने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है?

क्या जनता के टैक्स से चलने वाली विधायक निधि अब नगर पालिका के पुराने बकायों को चुकाने के लिए इस्तेमाल होगी?

अंधेरे में हरबर्टपुर, जिम्मेदार कौन?…..

पिछले 15 दिनों से स्ट्रीट लाइट बंद हैं। पूरा शहर अंधेरे में है। कारण बताया जा रहा है। ऊर्जा निगम का ₹1.18 करोड़ का बकाया, जो 15 वर्षों से लंबित है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर 15 साल से बकाया था, तो पहले कभी कनेक्शन क्यों नहीं काटे गये?

क्या पहले भुगतान होता रहा और अब अचानक व्यवस्था ध्वस्त हो गई?

या फिर अब “घोटालों का बोझ” इतना बढ़ चुका है कि सिस्टम जवाब दे गया?

विधायक निधि: विकास के लिए या कर्ज चुकाने के लिए?

नगर पालिका की मांग है कि इस बकाया राशि का भुगतान विधायक निधि या शासन से कराया जाए।

यहां मूल सवाल खड़ा होता है कि क्या विधायक निधि का उद्देश्य विकास कार्य है या भ्रष्ट व्यवस्थाओं के कर्ज चुकाना?

अगर हर संस्था अपना बकाया ऐसे ही विधायक निधि से चुकाने लगे, तो विकास योजनाओं का क्या होगा?

अब निगाहें सीधे मुन्ना सिंह चौहान पर हैं कि क्या वे इस मांग को मानते हैं या जवाबदेही तय करेंगे?

घोटालों की लंबी फेहरिस्त: संयोग या सुनियोजित खेल?

हरबर्टपुर नगर पालिका पहले से ही कई गंभीर आरोपों में घिरी हुई है।

कंडम (खराब) गाड़ी में डीजल दिखाकर भुगतान।

3 किमी दूरी को 41 किमी दिखाकर लाखों की बंदरबांट।

खरीद में भारी अनियमितता (₹30 की दवा ₹3300 में, ₹35 के दस्ताने ₹245 में)

2 बीघा जमीन पर बाजार, लेकिन 5.50 बीघा का भुगतान।

यह सब किसी एक गलती की ओर इशारा नहीं करता, बल्कि एक “सिस्टमेटिक फेल्योर” या सुनियोजित भ्रष्टाचार की तस्वीर पेश करता है।

सबसे चौंकाने वाला खुलासा: एजेंडे में था ही नहीं मामला!…

06 नवंबर 2025 की बोर्ड बैठक में जिस भुगतान को पास किया गया, वह एजेंडे में शामिल ही नहीं था।

तो फिर किस आधार पर 5.50 बीघा का भुगतान पास हुआ?

यह नियमों की अनदेखी नहीं, बल्कि नियमों का खुला उल्लंघन है?

RTI से खुली पोल, फिर भी खामोशी क्यों?….

इन सभी मामलों का खुलासा एक सभासद द्वारा RTI के जरिए किया गया।

अब सवाल और भी गंभीर हो जाता है कि जब दस्तावेजी प्रमाण सामने हैं, तो जांच क्यों नहीं?

जिम्मेदार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों पर कार्रवाई क्यों नहीं?

क्या यह “मौन समर्थन” है या “राजनीतिक संरक्षण”?

भाजपा की कथनी बनाम करनी में अन्तर…।

भाजपा सरकार और उसके जनप्रतिनिधि अक्सर “भ्रष्टाचार मुक्त शासन” की बात करते हैं। लेकिन हरबर्टपुर के हालात एक अलग ही कहानी बयां कर रहे हैं।

एक तरफ भ्रष्टाचार के आरोपों की भरमार।

दूसरी तरफ जनता अंधेरे में।

और तीसरी तरफ समाधान के नाम पर “विधायक निधि से भुगतान” की मांग।

यह सीधे-सीधे सवाल खड़ा करता है कि क्या यह “डबल इंजन” सरकार की जवाबदेही है या जिम्मेदारी से बचने का तरीका?

विधायक की भूमिका पर सीधा सवाल…..?

एक क्षेत्रीय विधायक होने के नाते मुन्ना सिंह चौहान की जिम्मेदारी बनती है कि,

इन मामलों की निष्पक्ष जांच कराएं।

दोषियों पर कार्रवाई सुनिश्चित करें।

और जनता को जवाब दें कि आखिर हरबर्टपुर को अंधेरे में किसने धकेला?

जनता का गुस्सा: अब जवाब चाहिए….!

“टैक्स हम दें, अंधेरे में हम चलें, और घोटाले कोई और करे,ये नहीं चलेगा!”

यह सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि हरबर्टपुर के जनता की आवाज बन चुका है।

हरबर्टपुर का मुद्दा अब सिर्फ नगर पालिका का नहीं रहा, यह राजनीतिक जवाबदेही, प्रशासनिक पारदर्शिता और जनता के अधिकारों की लड़ाई बन चुका है।

अब देखना यह है कि…

क्या विधायक इस मुद्दे पर सख्त रुख अपनाते हैं।

या फिर यह मामला भी “फाइलों में दबा” रह जाता है।

हरबर्टपुर पूछ रहा है कि अंधेरे का जिम्मेदार कौन? और जवाब देगा कौन?

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