“मनरेगा से ‘जी राम जी’ तक: पहाड़ में बढ़ती जटिलता, घटती उम्मीदें?”
ब्यूरों रिपोर्ट
देहरादून जिले के चकराता ब्लॉक के प्रधान संगठन की डाकपत्थर में हुई हालिया बैठक सिर्फ एक औपचारिक चर्चा नहीं थी, बल्कि यह उस बढ़ती बेचैनी की आवाज़ थी जो आज पहाड़ के गांव-गांव में सुनाई दे रही है। बैठक में उठाए गए मुद्दे सीधे तौर पर देश की सबसे बड़ी रोजगार गारंटी योजना, मनरेगा (अब ‘जी राम जी’ योजना) की जमीनी सच्चाई को उजागर करते हैं।
मुख्य सवाल: पैसा, प्रक्रिया और पहुंच….
बैठक में पांच प्रमुख बिंदुओं पर चर्चा हुई, लेकिन इनमें सबसे गंभीर मुद्दा था,मजदूरी भुगतान में देरी। पिछले तीन महीनों से हजारों मजदूर अपनी मेहनत की कमाई का इंतजार कर रहे हैं। जबकि केंद्र सरकार ने बजट में करीब 60 हजार करोड़ रुपये की व्यवस्था लंबित भुगतान के लिए बताई थी, ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग नजर आ रही है।
दूसरा बड़ा मुद्दा है मैटेरियल पेमेंट का, जिसमें 60% तक की राशि अब तक जारी नहीं हुई। इससे न सिर्फ विकास कार्य प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि ग्राम पंचायतों की वित्तीय स्थिति भी कमजोर पड़ रही है।
तकनीकी सुधार या नई बाधाएं?…..
सरकार ने ‘जी राम जी’ योजना के तहत पारदर्शिता बढ़ाने के लिए रेटिना स्कैन आधारित हाजिरी जैसी तकनीक लागू की है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह तकनीक पहाड़ी क्षेत्रों की वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप है?
चकराता जैसे दुर्गम इलाकों में आज भी नेटवर्क कनेक्टिविटी एक बड़ी समस्या है। ऐसे में ऑनलाइन या बायोमेट्रिक हाजिरी न सिर्फ मुश्किल, बल्कि कई बार असंभव हो जाती है। इसका सीधा असर मजदूरों की उपस्थिति और उनके भुगतान पर पड़ रहा है।
ई-केवाईसी: पहचान का संकट…..
तीसरा बड़ा मुद्दा है ई-केवाईसी प्रक्रिया। कई मजदूरों को इसमें तकनीकी और दस्तावेजी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। जिन लोगों के पास सीमित संसाधन और डिजिटल साक्षरता नहीं है, उनके लिए यह प्रक्रिया एक बड़ी बाधा बन गई है।
बढ़े रोजगार दिवस, लेकिन घटती भागीदारी…..।
सरकार ने रोजगार के दिनों को 100 से बढ़ाकर 125 करने का सकारात्मक कदम उठाया है। लेकिन जमीनी स्तर पर प्रधान संगठन का कहना है कि जटिल प्रक्रियाओं के कारण लोग अब काम मांगने से ही पीछे हट रहे हैं। अगर यही स्थिति रही, तो यह योजना अपने मूल उद्देश्य ग्रामीण रोजगार से भटक सकती है।
क्या यह एक सुनियोजित बदलाव है?….
प्रधान संगठन के बीच एक आशंका भी साफ तौर पर उभरकर आई है। क्या पहले योजना का नाम बदलकर और अब प्रक्रियाओं को जटिल बनाकर इसे धीरे-धीरे अप्रभावी करने की कोशिश हो रही है?
अगर लोग खुद ही काम मांगना बंद कर दें, तो भविष्य में इस योजना को बंद करने का तर्क भी आसान हो जाएगा।
सरकार के लिए चेतावनी या अवसर?…..
यह पूरा घटनाक्रम सरकार के लिए एक चेतावनी भी है और अवसर भी।
अगर समय रहते इन समस्याओं का समाधान नहीं किया गया, तो यह असंतोष आगामी चुनावों में बड़ा मुद्दा बन सकता है।
लेकिन अगर सरकार,
भुगतान प्रक्रिया को तेज करे,
तकनीकी बाधाओं को क्षेत्रीय परिस्थितियों के अनुसार ढाले,
और ई-केवाईसी को सरल बनाए,
तो यही योजना फिर से ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन सकती है।
नीयत बनाम नियोजन…..।
‘जी राम जी’ योजना की नीयत पर सवाल नहीं है, लेकिन उसका नियोजन ही आज सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।
पहाड़ के लोग काम करना चाहते हैं, उन्हें सिर्फ एक सरल, भरोसेमंद और सुलभ व्यवस्था चाहिए।
अगर सरकार इस संदेश को समय रहते समझ लेती है, तो यह न सिर्फ लाखों मजदूरों को राहत देगा, बल्कि एक मजबूत और विश्वासपूर्ण शासन की मिसाल भी पेश करेगा।
वरना, पहाड़ की यह खामोश नाराजगी जल्द ही एक बड़ा राजनीतिक शोर बन सकती है।



