उत्तराखंड

“आँखों का डॉक्टर बनने निकली थी… सिस्टम की अंधी गलियों में खुद ही खो गई।”

ब्यूरों रिपोर्ट,

महंत इंद्रेश चिकित्सा विश्वविद्यालय एक बार फिर सवालों के घेरे में है… और इस बार सवाल सिर्फ एक मौत का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता का है।

अंबाला से देहरादून आई युवा डॉक्टर तन्वी, जो “आँखों” की रोशनी बचाने का सपना लेकर आई थी, उसकी अपनी ही जिंदगी अंधेरे में डूब गई।

वह इसी विश्वविद्यालय से MS Eye (ऑप्थैल्मोलॉजी) की पढ़ाई कर रही थी… लेकिन 24 मार्च की सुबह उसकी ज़िंदगी की आखिरी सुबह बन गई।

तन्वी अपनी ही कार में मृत पाई गई।

हाथ में कैनोला लगा था।

हालात इतने सामान्य नहीं थे, जितना दिखाने की कोशिश की जा रही है।

आरोप बेहद गंभीर हैं…।

तन्वी के पिता ललित मोहन ने FIR में जो कहा है, वह सिर्फ एक परिवार का दर्द नहीं, पूरे सिस्टम पर सवाल है।

HOD प्रियंका गुप्ता पर लगातार मानसिक उत्पीड़न के आरोप।

थीसिस जमा करने को लेकर दबाव और टॉर्चर।

उत्पीड़न की रिकॉर्डेड बातचीत पुलिस को सौंपी गई।

पिता HOD से खुद मिले, लेकिन कोई राहत नहीं मिली।

एक बेटी, जो अपने पिता को भी उसी दर्द से गुजरते देख रही थी, अंदर से टूट गई।
और अंत इतना भयावह हुआ कि अब सिर्फ सवाल बचे हैं… जवाब नहीं।

यह सिर्फ एक “केस” नहीं है…।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह अपनी तरह की दूसरी घटना बताई जा रही है और दोनों बार नाम सामने आता है,
महंत इंद्रेश चिकित्सा विश्वविद्यालय का?

क्या यह महज़ संयोग है या सिस्टम में कुछ गहराई तक सड़ा हुआ है?

सबसे बड़ा सवाल…।

क्या मेडिकल शिक्षा के मंदिरों में छात्र सुरक्षित हैं?

क्या “डिग्री” के नाम पर मानसिक उत्पीड़न एक सामान्य बात बन चुका है?

और कब तक प्रतिभाएं इसी तरह दम तोड़ती रहेंगी?

यह मामला सिर्फ एक आत्महत्या या रहस्यमयी मौत नहीं है,
यह एक संस्थागत जिम्मेदारी, मानसिक उत्पीड़न और जवाबदेही की विफलता का मामला है।

अब क्या होना चाहिए?….

निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच।

आरोपितों पर सख्त कार्रवाई।

मेडिकल संस्थानों में एंटी-हैरासमेंट मैकेनिज्म की समीक्षा।

छात्रों के लिए सुरक्षित और संवेदनशील वातावरण सुनिश्चित हो।

आखिर में…..!

तन्वी अब वापस नहीं आएगी,
लेकिन अगर इस बार भी सिस्टम चुप रहा, तो यह खामोशी अगली “तन्वी” की मौत की वजह बनेगी।

“आँखें बंद करने से अंधेरा खत्म नहीं होता… सच का सामना करना ही होगा।”

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