हरिद्वार जेल क्वार्टर टेंडर पर घमासान: BRIDCUL पर समय से पहले बिड खारिज करने का आरोप।
ब्यूरों रिपोर्ट
देहरादून/हरिद्वार।
“डिस्ट्रिक्ट जेल कैंपस हरिद्वार में प्रस्तावित रेजिडेंस क्वार्टर (सिविल वर्क)” के टेंडर को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। एक प्रतिभागी फर्म ने BRIDCUL (ब्रिज, रूफ एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन ऑफ उत्तराखंड लिमिटेड) पर टेंडर प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं का आरोप लगाया है।
मामला NIT नंबर BRIDCUL/HQ-DDN/81/2025-26 से जुड़ा है। फर्म का दावा है कि उन्हें “नॉन-रिस्पॉन्सिव” घोषित कर दिया गया, जबकि NIT के अनुसार टेंडर फीस और EMD सहित आवश्यक दस्तावेजों की भौतिक जमा करने की अंतिम तिथि 06 मार्च 2026 निर्धारित थी। आरोप है कि तय समयसीमा से पहले ही बिड का मूल्यांकन कर फर्म को अयोग्य ठहरा दिया गया।
क्या है मुख्य आरोप?……
फर्म का कहना है कि,
जब तक टेंडर फीस और EMD की भौतिक रसीदों का सत्यापन नहीं हो जाता, तब तक बिड का अंतिम मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।
उन्हें किसी भी प्रकार की कमी या त्रुटि की पूर्व सूचना नहीं दी गई।
“नॉन-रिस्पॉन्सिव” घोषित करने के पीछे किस क्लॉज़ या पात्रता शर्त का आधार लिया गया, इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया।
फर्म ने इसे “प्रक्रिया-विरुद्ध, मनमाना और अपारदर्शी” कदम बताते हुए कड़ी आपत्ति दर्ज की है।
‘नेचुरल जस्टिस’ के उल्लंघन का आरोप….।
शिकायतकर्ता का तर्क है कि यदि दस्तावेजों में कोई कमी थी तो नियमों के तहत स्पष्टीकरण का अवसर दिया जाना चाहिए था। बिना कारण बताए और बिना सुधार का मौका दिए सीधे अयोग्य घोषित करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
पिछले टेंडरों पर भी उठे सवाल…।
फर्म ने यह भी आरोप लगाया है कि इसी टेंडर कमेटी द्वारा हैंडल किए गए कुछ पूर्व टेंडरों में भी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठे थे। ऐसे में यह मामला केवल एक टेंडर तक सीमित न रहकर पूरी मूल्यांकन प्रणाली पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है।
कानूनी कार्रवाई की चेतावनी….।
फर्म ने साफ किया है कि यदि निर्णय की समीक्षा कर पारदर्शी ढंग से प्रक्रिया दोबारा नहीं अपनाई गई, तो वे,
केंद्रीय सतर्कता आयोग में औपचारिक शिकायत,
सक्षम न्यायालय में कानूनी कार्यवाही,
तथा अन्य उपलब्ध वैधानिक उपाय अपनाने के लिए बाध्य होंगे।
बड़ा सवाल: क्या नियमों से पहले नतीजा?…
सरकारी खरीद प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सर्वोपरि मानी जाती है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि अंतिम तिथि शेष थी तो बिड को “नॉन-रिस्पॉन्सिव” घोषित करने की जल्दबाजी क्यों की गई?
वहीं BRIDCUL प्रबंधन का कहना है कि सभी प्रकिया नियम के तहत हुई है। अब देखना यह दिलचस्प होगा कि
क्या टेंडर प्रक्रिया की समीक्षा होगी या मामला कानूनी दहलीज तक पहुंचेगा?
यह विवाद आने वाले दिनों में उत्तराखंड की सरकारी खरीद प्रणाली पर व्यापक बहस छेड़ सकता है।
