उत्तराखंड

देवभूमि की ज़मीन पर किसका हक? सत्ता, सिस्टम और सन्नाटा……।

रिपोर्ट, विक्रम सिंह।

आज मन सचमुच व्याकुल है।
कभी जनता ने कांग्रेस के कथित भ्रष्टाचार के खिलाफ गुस्से में वोट दिया था। जनता ने भाजपा को इसलिए चुना क्योंकि उसे लगा था कि अब व्यवस्था बदलेगी, पारदर्शिता आएगी और “डबल इंजन” की सरकार प्रदेश को नई दिशा देगी।
लेकिन आज जो बातें ऊर्जा क्षेत्र के भीतर से सुनने को मिल रही हैं, वे किसी भी जागरूक नागरिक को बेचैन करने के लिए काफी हैं।

मामला जुड़ा है उत्तराखंड जल विद्युत निगम लिमिटेड की जमीनों से, वो जमीनें जिन पर प्रदेश की ऊर्जा व्यवस्था खड़ी है।

आरोप क्या हैं?…..

ऊर्जा निगम के कर्मचारियों और इंजीनियरों के बीच यह चर्चा है कि,
सरकारी जमीनों को औने-पौने दाम पर निजी हाथों में देने की तैयारी है।

अधिकारियों पर दबाव बनाया जा रहा है कि वे परियोजनाओं के लिए “कम से कम भूमि की आवश्यकता” दिखाएँ।

यदि किसी ने वास्तविक जरूरत लिख दी, तो ट्रांसफर और करियर खराब करने तक की धमकी दी जा रही है।

यूनियन द्वारा आवाज उठाने पर भी कथित रूप से दबाव और डर का माहौल बनाया जा रहा है।

सबसे गंभीर आरोप यह है कि शीर्ष स्तर से “टेक्निकल नैरेटिव” गढ़ने की कोशिश हो रही है। ताकि भविष्य में कहा जा सके कि “देखिए, इंजीनियरों ने खुद ही कम जमीन की आवश्यकता बताई थी।”

अगर यह सच है, तो यह केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि संस्थागत दबाव की कहानी है।

सवाल जो जवाब मांगते हैं…….।

यदि सरकारी जमीन बेचनी ही है, तो क्या उत्तराखंड के स्थानीय निवेशकों को प्राथमिकता नहीं मिलनी चाहिए?

ऊर्जा परियोजनाओं के लिए जमीन की वास्तविक जरूरत को कम दिखाने का दबाव क्यों?

क्या प्रदेश की संपत्ति के साथ ऐसा व्यवहार पारदर्शिता की कसौटी पर खरा उतरता है?

क्या सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग इन आरोपों की स्वतंत्र जांच करवाएंगे?

राजनीति बनाम जनविश्वास……..।

जब जनता ने भाजपा को चुना, तो उम्मीद थी कि भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी।
लेकिन अगर आज वही आरोप “रिकॉर्ड तोड़ने” के स्तर तक पहुँचने की चर्चा में हैं, तो यह केवल एक पार्टी की नहीं, पूरे राजनीतिक नैरेटिव की हार है।

प्रदेश के मुखिया पुष्कर सिंह धामी बार-बार पारदर्शिता और सुशासन की बात करते हैं। ऐसे में यह आवश्यक है कि वे स्वयं आगे आकर स्पष्ट करें कि,
क्या वाकई भूमि हस्तांतरण की कोई प्रक्रिया चल रही है?
क्या उसकी शर्तें सार्वजनिक हैं?
क्या किसी प्रकार का दबाव या आंतरिक असहमति दर्ज हुई है?

यह भी चिंताजनक है कि जिन इंजीनियरों और कर्मचारियों के कंधों पर प्रदेश की ऊर्जा व्यवस्था टिकी है, वे खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

ऊर्जा क्षेत्र कोई साधारण विभाग नहीं, यह विकास की रीढ़ है। यदि वहीं भय और दबाव का माहौल होगा, तो पारदर्शिता कैसे बचेगी?

मुद्दा केवल जमीन का नहीं है…….।

यह मामला सिर्फ जमीन बेचने या न बेचने का नहीं है।
यहां सवाल है कि,

क्या प्रदेश की संपत्ति का निर्णय पारदर्शी तरीके से होगा?

क्या स्थानीय हितों को प्राथमिकता मिलेगी?

क्या अधिकारी स्वतंत्र रूप से तकनीकी राय दे पाएंगे?

क्या भविष्य में इन फैसलों का ऑडिट और सार्वजनिक समीक्षा होगी?

अगर इन सवालों के जवाब न मिले, तो जनता के मन में अविश्वास की खाई और गहरी होगी।

लोकतंत्र में सन्नाटा सबसे खतरनाक………।

देवभूमि की जमीन केवल एक भू-खंड नहीं है।
यह प्रदेश की अस्मिता, संसाधन और आने वाली पीढ़ियों की पूंजी है।
सरकार को चाहिए कि,

सभी प्रस्तावित भूमि हस्तांतरणों की सूची सार्वजनिक करे।

मूल्यांकन प्रक्रिया और दरों का खुलासा करे।

स्वतंत्र तकनीकी और वित्तीय ऑडिट कराए।

कर्मचारियों और इंजीनियरों को बिना भय के अपनी राय रखने का अधिकार सुनिश्चित करे।

क्योंकि लोकतंत्र में सन्नाटा सबसे खतरनाक होता है और सवाल पूछना जनता का अधिकार।

आज ज़रूरत विपक्ष की राजनीति से ज़्यादा जवाबदेही की है।

आज ज़रूरत आरोप-प्रत्यारोप से ज़्यादा दस्तावेज़ों की है।

आज ज़रूरत बयानबाज़ी से ज़्यादा पारदर्शिता की है।

देवभूमि की जमीन किसी दल की नहीं प्रदेश की है।

और प्रदेश की संपत्ति पर पहला हक जनता का है।

अब गेंद सत्ता के पाले में है कि धामी सरकार जनता को विश्वास में लेकर काम करती है या एक कंपनी के सीईओ की तरह।

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