उत्तराखंड

डिग्री बिना एमडी.. क्या उत्तराखंड में योग्यता नहीं, ‘जुगाड़’ ही असली पात्रता है?

ब्यूरों रिपोर्ट, देहरादून

देवभूमि उत्तराखंड में नियुक्तियों की पारदर्शिता पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मामला है पावर ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन के मैनेजिंग डायरेक्टर (MD) पद पर पीसी ध्यानी की नियुक्ति का, एक ऐसी नियुक्ति, जिस पर हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणियों ने शासन-प्रशासन की नीयत और नीतियों दोनों को कटघरे में ला खड़ा किया है।

आरोप साफ है कि जिस पद के लिए इंजीनियरिंग स्नातक की डिग्री अनिवार्य थी, उस पर ऐसे व्यक्ति को बैठा दिया गया जिसके पास यह मूलभूत योग्यता ही नहीं थी।
और जब मामला अदालत पहुंचा, तो नियुक्ति का ठोस आधार पूछे जाने पर महंगे वकीलों और सरकारी वकीलों की फौज जवाब देने में मौन खड़ी रही। यह मौन क्या बताता है?

नियम क्या कहते हैं?….

उत्तराखंड चयन एवं नियुक्ति ऑफ मैनेजिंग डायरेक्टर एंड डायरेक्टर्स प्रक्रिया निर्धारण नियम 2021 के नियम 9-ए के अनुसार संबंधित पद के लिए निर्धारित शैक्षणिक योग्यता स्पष्ट रूप से अनिवार्य है। यदि इंजीनियरिंग की डिग्री आवश्यक है, तो उसके बिना नियुक्ति कैसे और क्यों की गई?

क्या नियम केवल दिखावे के लिए हैं?
या फिर नियमों को भी ‘व्यवस्था’ के हिसाब से मोड़ा जा सकता है?

शिकायतें हुई, पर सुनवाई नहीं….।

शासन से लेकर मुख्यमंत्री तक शिकायतों के प्रत्यावेदन दिए गए। लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। सवाल यह है कि क्या धामी सरकार में शिकायतें सिर्फ फाइलों में दबी रहने के लिए हैं? अगर जनता और कर्मचारी नियमों का पालन करें, लेकिन सरकार खुद नियमों को दरकिनार कर दे तो जवाबदेही किसकी होगी?

जवाबदेही से बचती सरकार?……

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार पर पहले भी नियुक्तियों और प्रशासनिक निर्णयों को लेकर सवाल उठते रहे हैं। लेकिन इस मामले में सवाल सिर्फ एक व्यक्ति की नियुक्ति का नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता का है।

केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार “पारदर्शिता” और “मेरिट” की बात करती है। पर यदि भाजपा-शासित राज्य में ही नियमों को ताक पर रखकर नियुक्तियां हों, तो क्या यह केंद्र की नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह जवाब मांगे?

जनता के विश्वास की हत्या?……

यह मामला सिर्फ एक पद या एक व्यक्ति का नहीं है। यह उस विश्वास का सवाल है, जो उत्तराखंड की जनता ने सरकार पर किया।
जब योग्य इंजीनियर बेरोजगार घूम रहे हों, प्रतियोगी परीक्षाओं में युवा दिन-रात मेहनत कर रहे हों और शीर्ष पदों पर बिना अनिवार्य योग्यता के नियुक्तियां हो जाएं, तो यह सिर्फ प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि जनता के विश्वास के साथ विश्वासघात है।

बड़ा सवाल…….?
क्या सरकार इस नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक करेगी?

क्या नियमों की अनदेखी करने वालों पर कार्रवाई होगी?

या फिर “दरियादिली” दिखाते हुए व्यवस्था को ही मौन रहने दिया जाएगा?

देवभूमि की राजनीति आज एक मोड़ पर खड़ी है। अगर पारदर्शिता और योग्यता की रक्षा नहीं हुई, तो आने वाली पीढ़ियां यही पूछेंगी कि,

क्या उत्तराखंड में मेहनत से ज्यादा मायने ‘मेहरबानी’ रखती है।

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