उत्तराखंड

अंकिता भण्डारी हत्याकांड: सीबीआई संस्तुति, जनदबाव और सत्ता के भीतर की दरार……..।

ब्यूरों रिपोर्ट

उत्तराखंड की राजनीति में अंकिता भण्डारी हत्याकांड पर भूचाल आया हुआ है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा इस मामले में सीबीआई जांच की संस्तुति कोई सामान्य प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि वर्षों से सुलगते जनआक्रोश, मातृशक्ति की पीड़ा, युवाओं के सवाल और सामाजिक संगठनों के निरंतर दबाव का परिणाम है। यह फैसला सत्ता की संवेदनशीलता से अधिक, उसकी मजबूरी को उजागर करता है।

मातृशक्ति का आक्रोश:बेटी न्याय नहीं, तो सत्ता नहीं….।

अंकिता केवल एक नाम नहीं रही। वह उत्तराखंड की हर मां-बहन-बेटी की आवाज बन चुकी है। मातृशक्ति ने सड़क से सोशल मीडिया तक स्पष्ट कहा कि,

“जब तक न्याय नहीं, तब तक चुप्पी नहीं”

राज्य की महिलाओं ने इस मामले को केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं माना, बल्कि नारी सुरक्षा और सत्ता के नैतिक दायित्व से जोड़कर देखा। यही कारण है कि सरकार के हर बयान पर भरोसे से अधिक संदेह हावी रहा।

युवा और सामाजिक संगठन: सवालों की घेराबंदी…..।

उत्तराखंड का युवा वर्ग, जो पहले ही बेरोज़गारी और पेपर लीक जैसे घोटालों से आहत है, अंकिता मामले में भी पारदर्शिता की मांग पर अडिग रहा। छात्र संगठनों, नागरिक मंचों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने लगातार पूछा,

वीआईपी एंगल की जांच कहां तक पहुंची?

क्यों रसूखदारों पर हाथ नहीं डाला गया?

गवाहों और साक्ष्यों की सुरक्षा का क्या हुआ?

इन सवालों ने सरकार को लगातार कठघरे में खड़ा रखा।

विपक्ष का हमला: न्याय में देरी, सत्ता की नीयत…..।

विपक्ष ने इस पूरे मामले को सत्ता-संरक्षण बनाम न्याय की लड़ाई बताया। हर मंच से यह आरोप गूंजा कि स्थानीय जांच एजेंसियों पर राजनीतिक दबाव है और सच को सीमित दायरे में बांधा जा रहा है। विपक्ष के लिए यह केवल एक मुद्दा नहीं, बल्कि सरकार की नैतिकता पर सीधा वार था।

त्रिवेंद्र सिंह रावत का बयान: सत्ता के भीतर की दरार………..।

इस पूरे घटनाक्रम में निर्णायक मोड़ तब आया, जब भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने सार्वजनिक रूप से बयान दिया।
गौर करने वाली बात यह है कि पेपर लीक मामले में सीबीआई जांच की मांग के बाद, अंकिता भण्डारी हत्याकांड पर भी सीबीआई जांच का समर्थन उन्हीं की ओर से आया।

यह बयान साधारण नहीं था। यह सत्ता के भीतर से उठी वह आवाज़ थी, जिसने धामी सरकार को बैकफुट पर ला दिया। जब अपनी ही पार्टी का पूर्व मुख्यमंत्री सवाल उठाए, तो उसे विपक्षी राजनीति कहकर टालना संभव नहीं रहता।

धामी सरकार बैकफुट पर क्यों आई?……….

लगातार जनदबाव।

मातृशक्ति और युवाओं का असंतोष।

विपक्ष की आक्रामक रणनीति।

और सबसे अहम त्रिवेंद्र रावत का बयान, जिसने पार्टी लाइन की चुप्पी तोड़ दी।

इन सबके सामने सरकार के पास विकल्प सीमित हो गए। नतीजा, सीबीआई जांच की संस्तुति।

सवाल अब भी बाकी है…………।

सीबीआई जांच की संस्तुति एक महत्वपूर्ण कदम है,

लेकिन जनता के मन में अब भी कई प्रश्न शेष हैं

क्या सीबीआई को पूरी स्वतंत्रता मिलेगी?

क्या राजनीतिक और रसूखदार चेहरों तक जांच पहुंचेगी?

क्या यह फैसला सचमुच न्याय के लिए है या दबाव कम करने की रणनीति?

न्याय की कसौटी पर सरकार………।

अंकिता भण्डारी हत्याकांड अब केवल एक आपराधिक मामला नहीं रहा। यह उत्तराखंड की सत्ता, संवेदनशीलता और जवाबदेही की परीक्षा बन चुका है।
यदि सीबीआई जांच निष्पक्ष और निर्भीक होती है, तो यह मातृशक्ति के आंसुओं को कुछ हद तक सुकून दे सकती है। लेकिन यदि यह भी फाइलों और बयानों तक सीमित रह गई, तो जनता का भरोसा और अधिक टूटेगा।

आज उत्तराखंड पूछ रहा है कि…..

“क्या अंकिता को सच में न्याय मिलेगा या यह भी दबाव में लिया गया एक और राजनीतिक फैसला साबित होगा?”

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