“जीरो टॉलरेंस या जीरो कंट्रोल? हरबर्टपुर घोटाले ने उड़ाई भाजपा सरकार के दावों की धज्जियां”

ब्यूरों रिपोर्ट
विकासनगर/हरबर्टपुर।
उत्तराखंड में भ्रष्टाचार पर “जीरो टॉलरेंस” का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार अब अपने ही सिस्टम के सामने सवालों के घेरे में खड़ी दिखाई दे रही है। हरबर्टपुर नगर पालिका में उजागर हुआ डीजल-पेट्रोल और खरीद घोटाला सिर्फ एक स्थानीय अनियमितता नहीं, बल्कि उन दावों पर सीधा तमाचा है, जिन्हें मंचों से बार-बार दोहराया जाता रहा है।
जब ‘कंडम गाड़ी’ भी पी गई लाखों का डीजल…
पालिका परिसर में सालों से खड़ी कबाड़ गाड़ी कागजों में रोज सड़कों पर दौड़ती रही और डीजल भी गटकती रही। सवाल ये है कि क्या ये सिर्फ कागजी खेल था या सिस्टम की मिलीभगत का जिंदा उदाहरण?
3 किमी से 41 किमी: ये गणित नहीं, ‘घोटाला विज्ञान’ है…।
हरबर्टपुर से ढकरानी की दूरी 3 किमी… लेकिन लॉगबुक में 41 किमी।
धर्मावाला 81 किमी, देहरादून 131 किमी…
ऐसा लगता है मानो नगरपालिका में दूरी नहीं, ‘मुनाफा’ मापा जा रहा था।
लॉगबुक नहीं, ‘लूटबुक’ बन गई व्यवस्था…।
वाहनों की डेली एंट्री एक ऐसी किताब बन गई, जिसमें हर पन्ना सरकारी पैसे की कहानी नहीं, बल्कि बंदरबांट की स्क्रिप्ट लिखता नजर आता है।
खरीद में भी ‘कमाल का खेल’…।
₹30 की दवा ₹3300 में…
₹35 के दस्ताने ₹250 में…
ये सिर्फ महंगाई नहीं, ‘मिलकर खाई’ का मॉडल दिखता है।
जमीन भुगतान में भी ‘डबल इंजन’ की रफ्तार….
₹64,000 प्रति बीघा की जमीन का भुगतान दोगुना से भी ज्यादा!
यहां इंजन विकास का नहीं, भुगतान बढ़ाने का तेज दौड़ता दिख रहा है।
RTI ने खोली पोल, सरकार अब मौन क्यों?…..
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरे खेल का पर्दाफाश किसी विपक्ष ने नहीं, बल्कि एक सभासद की RTI से हुआ।
अब सवाल उठता है कि,
जब नीचे से सच्चाई निकलकर सामने आ रही है, तो ऊपर से खामोशी क्यों?
‘जीरो टॉलरेंस’ या ‘सिलेक्टिव साइलेंस’?…….
भ्रष्टाचार पर सख्ती के बड़े-बड़े दावे करने वाली भाजपा सरकार के लिए यह मामला ‘न उगलते बन रहा है, न निगलते’।
अगर कार्रवाई होती है तो अपने ही सिस्टम पर सवाल खड़े होंगे…
और अगर नहीं होती, तो “जीरो टॉलरेंस” सिर्फ एक जुमला साबित होगा।
जनता पूछ रही है- जवाब कौन देगा?….
क्या नगरपालिका अध्यक्ष अनजान थे?
क्या प्रशासन को भनक नहीं लगी?
या फिर सब कुछ जानते हुए भी आंखें मूंद ली गईं?
अब असली परीक्षा सरकार की….।
यह मामला सिर्फ हरबर्टपुर का नहीं, सरकार की साख का है।
अगर यहां भी लीपापोती हुई, तो “भ्रष्टाचार मुक्त उत्तराखंड” का सपना सिर्फ भाषणों तक सिमट जाएगा।
आखिरी सवाल?
क्या इस घोटाले पर कार्रवाई होगी…
या फिर “जीरो टॉलरेंस” का नारा, फाइलों में ही दम तोड़ देगा?